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*श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा🙏🙏 **एक समय बृहस्पति जी ब्रह्माजी से बोले- हे ब्रह्मन श्रेष्ठ! चैत्र व आश्विन मास के शुक्लपक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? इस व्रत का क्या फल है, इसे किस प्रकार करना उचित है? पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहिये।By वनिता कासनियां पंजाबबृहस्पतिजी का ऐसा प्रश्न सुन ब्रह्माजी ने कहा- हे बृहस्पते! प्राणियों के हित की इच्छा से तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेव, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। यह नवरात्र व्रत संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र की कामना वाले को पुत्र, धन की लालसा वाले को धन, विद्या की चाहना वाले को विद्या और सुख की इच्छा वाले को सुख मिलता है। इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है। मनुष्य की संपूर्ण विपत्तियां दूर हो जाती हैं और घर में समृद्धि की वृद्धि होती है, बन्ध्या को पुत्र प्राप्त होता है। समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है और मन का मनोरथ सिद्ध हो जाता है। जो मनुष्य इस नवरात्र व्रत को नहीं करता वह अनेक दुखों को भोगता है और कष्ट व रोग से पीड़ित हो अंगहीनता को प्राप्त होता है, उसके संतान नहीं होती और वह धन-धान्य से रहित हो, भूख और प्यास से व्याकूल घूमता-फिरता है तथा संज्ञाहीन हो जाता है। जो सधवा स्त्री इस व्रत को नहीं करती वह पति सुख से वंचित हो नाना दुखों को भोगती है। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और दस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा का श्रवण करे।हे बृहस्पते! जिसने पहले इस महाव्रत को किया है वह कथा मैं तुम्हें सुनाता हूं तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्माण मनुष्यों का कल्याम करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण में आए हुए मुझ पर कृपा करो।ब्रह्माजी बोले- प्राचीन काल में मनोहर नगर में पीठत नाम का एक अनाथ ब्राह्मण रहता था, वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके संपूर्ण सद्गुणों से युक्त सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। वह कन्या सुमति अपने पिता के घर बाल्यकाल में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन जब दुर्गा की पूजा करके होम किया करता, वह उस समय नियम से वहां उपस्थित रहती। एक दिन सुमति अपनी सखियों के साथ खेल में लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और वह पुत्री से कहने लगा अरी दुष्ट पुत्री! आज तूने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ट रोगी या दरिद्र मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।पिता का ऐसा वचन सुन सुमति को बड़ा दुख हुआ और पिता से कहने लगी- हे पिता! मैं आपकी कन्या हूं तथा सब तरह आपके आधीन हूं जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। राजा से, कुष्टी से, दरिद्र से अथवा जिसके साथ चाहो मेरा विवाह कर दो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है, मेरा तो अटल विश्वास है जो जैसा कर्म करता है उसको कर्मों के अनुसार वैसा ही फल प्राप्त होता है क्योंकि कर्म करना मनुष्य के आधीन है पर फल देना ईश्वर के आधीन है।जैसे अग्नि में पड़ने से तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं। इस प्रकार कन्या के निर्भयता से कहे हुए वचन सुन उस ब्राह्मण ने क्रोधित हो अपनी कन्या का विवाह एक कुष्टी के साथ कर दिया और अत्यन्त क्रोधित हो पुत्री से कहने लगा-हे पुत्री! अपने कर्म का फल भोगो, देखें भाग्य के भरोसे रहकर क्या करती हो? पिता के ऐसे कटु वचनों को सुन सुमति मन में विचार करने लगी- अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह कन्या अपने पति के साथ वन में चली गई और डरावने कुशायुक्त उस निर्जन वन में उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की।उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देख देवी भगवती ने पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रगट हो सुमति से कहा- हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुझसे प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो सो वरदान मांग सकती हो। भगवती दुर्गा का यह वचन सुन ब्राह्मणी ने कहा- आप कौन हैं वह सब मुझसे कहो? ब्राह्मणी का ऐसा वचन सुन देवी ने कहा कि मैं आदि शक्ति भगवती हूं और मैं ही ब्रह्मविद्या व सरस्वती हूं। प्रसन्न होने पर मैं प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतांत सुनाती हूं सुनो! तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया। उन लोगों ने तुझको और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न जल ही पिया इस प्रकार नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ, इस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर मैं तुझे मनोवांछित वर देती हूं, तुम्हारी जो इच्छा हो सो मांगो।इस प्रकार दुर्गा के वचन सुन ब्राह्मणी बोली अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे। मैं आपको प्रणाम करती हूं कृपा करके मेरे पति का कोढ़ दूर करो। देवी ने कहा- उन दिनों तुमने जो व्रत किया था उस व्रत का एक दिन का पुण्य पति का कोढ़ दूर करने के लिए अर्पण करो, उस पुण्य के प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से मुक्त हो जाएगा।ब्रह्मा जी बोले- इस प्रकार देवी के वचन सुन वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से जब उसने तथास्तु (ठीक है) ऐसा वचन कहा, तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ट रोग से रहित हो अति कान्तिवान हो गया। वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देख देवी की स्तुति करने लगी- हे दुर्गे! आप दुर्गति को दूर करने वाली, तीनों लोकों का सन्ताप हरने वाली, समस्त दु:खों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न हो मनोवांछित वर देने वाली और दुष्टों का नाश करने वाली जगत की माता हो। हे अम्बे! मुझ निरपराध अबला को मेरे पिता ने कुष्टी मनुष्य के साथ विवाह कर घर से निकाल दिया। पिता से तिरस्कृत निर्जन वन में विचर रही हूं, आपने मेरा इस विपदा से उद्धार किया है, हे देवी। आपको प्रणाम करती हूं। मेरी रक्षा करो।ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! उस ब्राह्मणी की ऐसी स्तुति सुन देवी बहुत प्रसन्न हुई और ब्राह्मणी से कहा- हे ब्राह्मणी! तेरे उदालय नामक अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीध्र उत्पन्न होगा। ऐसा वर प्रदान कर देवी ने ब्राह्मणी से फिर कहा कि हे ब्राह्मणी! और जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मांग ले। भगवती दुर्गा का ऐसा वचन सुन सुमति ने कहा कि हे भगवती दुर्गे! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्र व्रत की विधि और उसके फल का विस्तार से वर्णन करें।महातम्य- इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुन दुर्गा ने कहा- हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हें संपूर्ण पापों को दूर करने वाले नवरात्र व्रत की विधि बतलाती हूं जिसको सुनने से मोक्ष की प्राप्ति होती है- आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करें।विद्वान ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापन करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचें। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवी की मूर्तियां स्थापित कर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से विधिपूर्वक अर्घ्य दें। बिजौरा के फल से अर्घ्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से अर्घ्य देने से कीर्ति, दाख से अर्घ्य देने से कार्य की सिद्धि होती है, आंवले से अर्घ्य देने से सुख की प्राप्ति और केले से अर्घ्य देने से आभूषणों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार पुष्पों व फलों से अर्घ्य देकर व्रत समाप्त होने पर नवें दिन यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, शहद, जौ, तिल, बिल्व (बेल), नारियल, दाख और कदम्ब आदि से हवन करें। गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, खीर एवं चम्पा के पुष्पों से धन की और बेल पत्तों से तेज व सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति की और केले से पुत्र की, कमल से राज सम्मान की और दाखों से संपदा की प्राप्ति होती है। खांड, घी, नारियल, शहद, जौ और तिल तथा फलों से होम करने से मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला मनुष्य इस विधि विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस प्रकार बताई हुई विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना फल मिलता है। इस नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मंदिर अथवा घर में विधि के अनुसार करें।ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अर्न्तध्यान हो गई। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूवर्क करता है वह इस लोक में सुख प्राप्त कर अन्त में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता है।हे बृहस्पते! यह इस दुर्लभ व्रत का महात्म्य है जो मैंने तुम्हें बतलाया है। यह सुन बृहस्पति जी आनन्द से प्रफुल्लित हो ब्राह्माजी से कहने लगे कि हे ब्रह्मन! आपने मुझ पर अति कृपा की जो मुझे इस नवरात्र व्रत का महात्6य सुनाया। ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते! यह देवी भगवती शरक्ति संपूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है? बोलो देवी भगवती की जय।व्रत की विधि प्रात: नित्यकर्म से निवृत हो, स्नान कर, मंदिर में या घर पर ही नवरात्र में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा करनी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष लाभदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विध्न दूर हो जाते हैं तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।*********प्रार्थनाहे परमेश्वरी! मेरे द्वारा रात दिन सहस्त्रों अपराध होत हैं 'यह मेरा दास है' समझ कर मेरे अपराधों को क्षमा करो। हे परमेश्वरी! मैं आह्वान, विसर्जन और पूजन करना नहीं जानता, मुझे क्षमा करो। हे सुरेश्वरी! मैंने जो मंत्रहीन, क्रियाहीन, भक्तयुक्त पूजन किया है वह स्वीकार करो। हे परमेश्वरी! अज्ञान से, भूल से अथवा बुद्धि भ्रान्ति से जो न्यूनता अथवा अधिकता हो गई है उसे क्षमा करिये तथा प्रसन्न होईये।जाप मंत्र- ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नम:। मनोकामना सिद्धि के लिए इस मंत्र को 108 बार या सुविधा अनुसार जाप करें।. *बाबा विश्वनाथ धाम खरसुलिया अलीगंज एटा उत्तर प्रदेश** *हर हर महादेव ** *जय सियाराम जी ** II जय श्री श्याम जी II

*श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा🙏🙏 **
एक समय बृहस्पति जी ब्रह्माजी से बोले- हे ब्रह्मन श्रेष्ठ! चैत्र व आश्विन मास के शुक्लपक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? इस व्रत का क्या फल है, इसे किस प्रकार करना उचित है? पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहिये।

By वनिता कासनियां पंजाब

बृहस्पतिजी का ऐसा प्रश्न सुन ब्रह्माजी ने कहा- हे बृहस्पते! प्राणियों के हित की इच्छा से तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेव, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। यह नवरात्र व्रत संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र की कामना वाले को पुत्र, धन की लालसा वाले को धन, विद्या की चाहना वाले को विद्या और सुख की इच्छा वाले को सुख मिलता है। 

इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है। मनुष्य की संपूर्ण विपत्तियां दूर हो जाती हैं और घर में समृद्धि की वृद्धि होती है, बन्ध्या को पुत्र प्राप्त होता है। समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है और मन का मनोरथ सिद्ध हो जाता है। 

जो मनुष्य इस नवरात्र व्रत को नहीं करता वह अनेक दुखों को भोगता है और कष्ट व रोग से पीड़ित हो अंगहीनता को प्राप्त होता है, उसके संतान नहीं होती और वह धन-धान्य से रहित हो, भूख और प्यास से व्याकूल घूमता-फिरता है तथा संज्ञाहीन हो जाता है। 

जो सधवा स्त्री इस व्रत को नहीं करती वह पति सुख से वंचित हो नाना दुखों को भोगती है। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और दस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा का श्रवण करे।

हे बृहस्पते! जिसने पहले इस महाव्रत को किया है वह कथा मैं तुम्हें सुनाता हूं तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्माण मनुष्यों का कल्याम करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण में आए हुए मुझ पर कृपा करो।

ब्रह्माजी बोले- प्राचीन काल में मनोहर नगर में पीठत नाम का एक अनाथ ब्राह्मण रहता था, वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके संपूर्ण सद्गुणों से युक्त सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। 

वह कन्या सुमति अपने पिता के घर बाल्यकाल में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन जब दुर्गा की पूजा करके होम किया करता, वह उस समय नियम से वहां उपस्थित रहती। एक दिन सुमति अपनी सखियों के साथ खेल में लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। 

उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और वह पुत्री से कहने लगा अरी दुष्ट पुत्री! आज तूने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ट रोगी या दरिद्र मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा।

पिता का ऐसा वचन सुन सुमति को बड़ा दुख हुआ और पिता से कहने लगी- हे पिता! मैं आपकी कन्या हूं तथा सब तरह आपके आधीन हूं जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। राजा से, कुष्टी से, दरिद्र से अथवा जिसके साथ चाहो मेरा विवाह कर दो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है, मेरा तो अटल विश्वास है जो जैसा कर्म करता है उसको कर्मों के अनुसार वैसा ही फल प्राप्त होता है क्योंकि कर्म करना मनुष्य के आधीन है पर फल देना ईश्वर के आधीन है।

जैसे अग्नि में पड़ने से तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं। इस प्रकार कन्या के निर्भयता से कहे हुए वचन सुन उस ब्राह्मण ने क्रोधित हो अपनी कन्या का विवाह एक कुष्टी के साथ कर दिया और अत्यन्त क्रोधित हो पुत्री से कहने लगा-हे पुत्री! 

अपने कर्म का फल भोगो, देखें भाग्य के भरोसे रहकर क्या करती हो? पिता के ऐसे कटु वचनों को सुन सुमति मन में विचार करने लगी- अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई वह कन्या अपने पति के साथ वन में चली गई और डरावने कुशायुक्त उस निर्जन वन में उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की।

उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देख देवी भगवती ने पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रगट हो सुमति से कहा- हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुझसे प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो सो वरदान मांग सकती हो। भगवती दुर्गा का यह वचन सुन ब्राह्मणी ने कहा- आप कौन हैं वह सब मुझसे कहो? 

ब्राह्मणी का ऐसा वचन सुन देवी ने कहा कि मैं आदि शक्ति भगवती हूं और मैं ही ब्रह्मविद्या व सरस्वती हूं। प्रसन्न होने पर मैं प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।

तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतांत सुनाती हूं सुनो! तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया। 

उन लोगों ने तुझको और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न जल ही पिया इस प्रकार नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ, इस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर मैं तुझे मनोवांछित वर देती हूं, तुम्हारी जो इच्छा हो सो मांगो।

इस प्रकार दुर्गा के वचन सुन ब्राह्मणी बोली अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे। मैं आपको प्रणाम करती हूं कृपा करके मेरे पति का कोढ़ दूर करो। देवी ने कहा- उन दिनों तुमने जो व्रत किया था उस व्रत का एक दिन का पुण्य पति का कोढ़ दूर करने के लिए अर्पण करो, उस पुण्य के प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से मुक्त हो जाएगा।

ब्रह्मा जी बोले- इस प्रकार देवी के वचन सुन वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से जब उसने तथास्तु (ठीक है) ऐसा वचन कहा, तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ट रोग से रहित हो अति कान्तिवान हो गया। 

वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देख देवी की स्तुति करने लगी- हे दुर्गे! आप दुर्गति को दूर करने वाली, तीनों लोकों का सन्ताप हरने वाली, समस्त दु:खों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न हो मनोवांछित वर देने वाली और दुष्टों का नाश करने वाली जगत की माता हो। 

हे अम्बे! मुझ निरपराध अबला को मेरे पिता ने कुष्टी मनुष्य के साथ विवाह कर घर से निकाल दिया। पिता से तिरस्कृत निर्जन वन में विचर रही हूं, आपने मेरा इस विपदा से उद्धार किया है, हे देवी। आपको प्रणाम करती हूं। मेरी रक्षा करो।

ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! उस ब्राह्मणी की ऐसी स्तुति सुन देवी बहुत प्रसन्न हुई और ब्राह्मणी से कहा- हे ब्राह्मणी! तेरे उदालय नामक अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीध्र उत्पन्न होगा। 

ऐसा वर प्रदान कर देवी ने ब्राह्मणी से फिर कहा कि हे ब्राह्मणी! और जो कुछ तेरी इच्छा हो वह मांग ले। भगवती दुर्गा का ऐसा वचन सुन सुमति ने कहा कि हे भगवती दुर्गे! अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्र व्रत की विधि और उसके फल का विस्तार से वर्णन करें।

महातम्य- इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुन दुर्गा ने कहा- हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हें संपूर्ण पापों को दूर करने वाले नवरात्र व्रत की विधि बतलाती हूं जिसको सुनने से मोक्ष की प्राप्ति होती है- आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करें।

विद्वान ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापन करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचें। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवी की मूर्तियां स्थापित कर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से विधिपूर्वक अर्घ्य दें। 

बिजौरा के फल से अर्घ्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से अर्घ्य देने से कीर्ति, दाख से अर्घ्य देने से कार्य की सिद्धि होती है, आंवले से अर्घ्य देने से सुख की प्राप्ति और केले से अर्घ्य देने से आभूषणों की प्राप्ति होती है। इस प्रकार पुष्पों व फलों से अर्घ्य देकर व्रत समाप्त होने पर नवें दिन यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, शहद, जौ, तिल, बिल्व (बेल), नारियल, दाख और कदम्ब आदि से हवन करें। 

गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, खीर एवं चम्पा के पुष्पों से धन की और बेल पत्तों से तेज व सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति की और केले से पुत्र की, कमल से राज सम्मान की और दाखों से संपदा की प्राप्ति होती है। खांड, घी, नारियल, शहद, जौ और तिल तथा फलों से होम करने से मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। 

व्रत करने वाला मनुष्य इस विधि विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस प्रकार बताई हुई विधि के अनुसार जो व्यक्ति व्रत करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। 

इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना फल मिलता है। इस नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मंदिर अथवा घर में विधि के अनुसार करें।

ब्रह्मा जी बोले- हे बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अर्न्तध्यान हो गई। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूवर्क करता है वह इस लोक में सुख प्राप्त कर अन्त में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता है।

हे बृहस्पते! यह इस दुर्लभ व्रत का महात्म्य है जो मैंने तुम्हें बतलाया है। यह सुन बृहस्पति जी आनन्द से प्रफुल्लित हो ब्राह्माजी से कहने लगे कि हे ब्रह्मन! आपने मुझ पर अति कृपा की जो मुझे इस नवरात्र व्रत का महात्6य सुनाया। 

ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते! यह देवी भगवती शरक्ति संपूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है? बोलो देवी भगवती की जय।

व्रत की विधि प्रात: नित्यकर्म से निवृत हो, स्नान कर, मंदिर में या घर पर ही नवरात्र में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा करनी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष लाभदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विध्न दूर हो जाते हैं तथा सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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प्रार्थना

हे परमेश्वरी! मेरे द्वारा रात दिन सहस्त्रों अपराध होत हैं 'यह मेरा दास है' समझ कर मेरे अपराधों को क्षमा करो। हे परमेश्वरी! मैं आह्वान, विसर्जन और पूजन करना नहीं जानता, मुझे क्षमा करो। हे सुरेश्वरी! मैंने जो मंत्रहीन, क्रियाहीन, भक्तयुक्त पूजन किया है वह स्वीकार करो। हे परमेश्वरी! अज्ञान से, भूल से अथवा बुद्धि भ्रान्ति से जो न्यूनता अथवा अधिकता हो गई है उसे क्षमा करिये तथा प्रसन्न होईये।
जाप मंत्र- ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नम:। मनोकामना सिद्धि के लिए इस मंत्र को 108 बार या सुविधा अनुसार जाप करें।.
 *बाबा विश्वनाथ धाम खरसुलिया
 अलीगंज एटा उत्तर प्रदेश**
        *हर हर महादेव **
          *जय सियाराम जी **
            II जय श्री श्याम जी II

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*❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️ 🥀👣🥀जय माँ महागौरी🥀👣🥀 ⛳🕉️⛳शुभ दिन⛳🕉️⛳ *बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम*🌹🙏🙏🌹------------------------------------------------------------------- 🌼‼️🙏‼️🌼------------------------------------------------------------------- 🥀 श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। 🌀 महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥"दुर्गा अष्टमी की समस्त माँ भक्तो को हार्दिक शुभकामनाएं" 💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥**आज माता का अष्टम स्वरूप माँ महागौरी के श्री चरणों में नमन करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि माताआप सभी को सुख-शांति व आरोग्य प्रदान करे**।

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दुर्गा माँBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबदेवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया।परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति और गतिविधियों की चर्चा देवी महात्म्यम में आगे की गई है। दुर्गा, भगवान शिव की पत्नी पार्वती का एक और पहलू है। देवी काली को उनके अवतारों में से एक माना जाता है। उन्हें दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती की माँ के रूप में चित्रित किया जाता है, जिन्हें अश्विन के महीने में मनाया जाने वाला नवरात्रि भी कहा जाता है।देवी दुर्गा की उत्पत्तिदेवी महात्म्यम के अनुसार, देवी दुर्गा का गठन असुर महिष से लड़ने के लिए एक योद्धा देवी के रूप में किया गया था। दानव ने पृथ्वी, स्वर्ग और नरक को आतंकित कर दिया था और देवता उसे हराने में विफल रहे क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक पुरुष द्वारा पराजित नहीं होने का वरदान दिया था। ब्रह्मा के नेतृत्व में देवताओं ने विष्णु और शिव से मदद के लिए संपर्क किया। पवित्र त्रिमूर्ति ने तब अपनी दिव्य चमक को एकजुट किया और देवी दुर्गा प्रकट हुईं। वह महिषासुर का सफाया करने और सभी दिव्य प्राणियों को बचाने के लिए उभरी थी। उसने शिव के त्रिशूल, विष्णु के चक्र, ब्रह्मा के कमंडलु, इंद्र के वज्र, कुबेर के रत्नहार आदि विभिन्न देवताओं से अपने हथियार प्राप्त किए।बाल वनिता महिला आश्रमराक्षसी महिषासुर ने उन दोनों के बीच एक लड़ाई में उसके बदलते रूपों के खिलाफ एक उग्र लड़ाई लड़ी, लेकिन आखिरकारदुर्गा माँ ने उसका वाढ कर दिया। इस प्रकार, वह महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी जानी जाती है – महिषासुर का वध करने वाली।अपने विभिन्न पहलुओं में देवी की पूजा शरद ऋतु में की जाती है, जो बंगाल में फसल के मौसम के उद्घाटन का प्रतीक है। दुर्गा की शरदकालीन पूजा में, उनका पहला प्रतिनिधि बिल्व वृक्ष की एक शाखा है। दूसरे चरण में प्रतिनिधि नवपात्रिका है – मादा वृक्ष, अन्य पौधों और जड़ी-बूटियों के पेड़ के साथ बनाया गया। इसके अलावा मां को अक्सर चावल (धान्यरूप) के साथ पूजा में पहचाना जाता है। दुर्गा का एक उपपत्नी शाकाम्वरी है, अर्थात जड़ी-बूटी पौष्टिक देवी।देवी दुर्गा की कथादेवी दुर्गा को देवी का अवतार माना जाता है जिसके कई रूप हैं। देवी कई किंवदंतियों से जुड़ी हुई हैं जैसे कि पार्वती और भगवान शिव की कथा, रावण, शिव और पार्वती की कथा, भगवान राम और दुर्गा की कथा और विष्णु की पौराणिक कथा पार्वती की कथा।देवी दुर्गा के अवतारदेवी दुर्गा के कई अवतार और अवतार हैं, जैसे गौरी, भवानी, ललिता, कमंडलिनी, राजेश्वरी, जावा आदि। इनके अलावा, उनके 9 अन्य पदनाम भी हैं जिन्हें नव दुर्गा, ब्रह्मचारिणी, शैलपुत्री, चंद्रघंटा, कालरात्रि, स्कंदमाता, सिद्धिदात्री, महागौरी, कुसुमंदा और कात्यायनी के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गा के अन्य अवतारों में पार्वती, करुणामयी, अंबिका और काली शामिल हैं।देवी दुर्गा की विशेषताएँ और प्रतीकआमतौर पर, देवी दुर्गा को लाल रंग के कपड़े (साड़ी) पहनाया जाता है, जहां रंग लाल कार्रवाई और बुराई से सुरक्षा का प्रतीक है। उसे कई वस्तुओं को ले जाने वाली 10 या 8 भुजाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जो हिंदू धर्म में 10 दिशाओं या 8 चौकों का प्रतीक है, जो यह भी दर्शाता है कि वह भक्तों को सभी दिशाओं से बचाता है। दुर्गा को 3 आँखें होने के रूप में भी चित्रित किया गया है और इस प्रकार, उन्हें त्रयम्बक भी कहा जाता है जिसका अर्थ है 3 आँखें देवी। दाईं आंख सूर्य द्वारा प्रतीक कार्रवाई का प्रतीक है, बाईं आंख चंद्रमा की ओर संकेत करती है; और केंद्रीय नेत्र अग्नि के प्रतीक ज्ञान को दर्शाता है।पूँजीवादी पितृसत्ता एक साथ निजीकरण और मातृत्व से प्यार करने वाली माताओं और स्वस्थ शिशुओं के संस्थागतकरण की है। गंगा के डेल्टा में बंगालियों की विशिष्ट पहचान के रूप में उभरने के साथ, टेंडर मदरहुड की भावना की पुष्टि प्राकृतिक सेटिंग में हुई, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इतनी स्पष्ट रूप से अच्छी तरह से पानी और उपजाऊ (सुजलान सुपहलंग, शस्यश्यामलांग) बताया। मिट्टी की प्राकृतिक इनाम ने एक स्नेही माँ के रूप में बंगाल के प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित किया, जो अपने बच्चों की मांगों का जवाब देने के लिए तैयार थी। धार्मिक दुर्जनों के अलावा, देवी दुर्गा राष्ट्रवाद और अर्थव्यवस्था के स्तंभों के बीच अपने मावेरिक्स का नक्शा बनाती हैं। वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी देवता है।शेर या बाघ को आमतौर पर दुर्गा के वाहन के रूप में देखा जाता है। सिंह में शक्ति, दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति को दर्शाया गया है। शेर की सवारी करने वाली देवी दुर्गा इन गुणों पर उनकी विशेषज्ञता का प्रतीक हैं। दुर्गा को अभय मुद्रा स्थिति में शेर पर देखा जाता है, जो भय से मुक्ति का प्रमाण देता है। एक जीव में सभी कोशिकाओं का कुल योग एक व्यक्ति होता है, इसलिए प्रत्येक कोशिका एक कोशिका की तरह होती है और उनका योग भगवान होता है और उससे परे वह निरपेक्ष होता है।देवी दुर्गा के अस्त्र शस्त्रदेवी दुर्गा के पास कई अस्त्र शस्त्र हैं। उसके हाथ में शंख डरा हुआ ओम या प्रणव का प्रतिनिधित्व करता है; वज्र दृढ़ता का प्रतिनिधित्व करता है; धनुष और तीर ऊर्जा का प्रतीक है; सुदर्शन चक्र जो उंगली पर घूमता है, यह दर्शाता है कि पूरी दुनिया उसके लिए आज्ञाकारी है और उसकी आज्ञा पर है; देवी दुर्गा द्वारा रखी गई तलवार ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है जो संदेह से बंधी नहीं है; त्रिशूल या त्रिशूल 3 अलग-अलग गुणों का प्रतीक है, राजस (गतिविधि), सतवा (निष्क्रियता) और तमस (गैर-गतिविधि)। वह मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक अर्थात् दुखों के 3 रूपों का उन्मूलनकर्ता भी है। देवी दुर्गा द्वारा धारण किया गया कमल, पूरी तरह से फूला नहीं समाता, सफलता का आश्वासन देता है, लेकिन अंतिमता नहीं।देवी दुर्गा की पूजादेवी दुर्गा की पूजा पूरे देश में की जाती है। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, झारखंड और बिहार में प्रमुख वार्षिक त्योहार है। महिषासुर पर दुर्गा की विजय दशहरे के रूप में मनाई जाती है, जिसे बंगाली में विजयदशमी के रूप में भी जाना जाता है। दशहरा को उत्तर भारत में रावण के खिलाफ राम की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को कश्मीर में शारिका के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि भक्ति के दौरान शक्ति उपासक देवी के 9 पहलुओं पर ध्यान करते हैं, जिन्हें नव दुर्गा के रूप में जाना जाता है। दशहरा नवरात्रि दक्षिण भारत में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को मैसूर में चामुंडेश्वरी कहा जाता है।नवरात्रि पूरे गुजरात में मनाई जाती है और अंतिम दिन महिषासुरमर्दिनी की विजय के उपलक्ष्य में गरबा का आयोजन किया जाता है। गोवा में, देवी दुर्गा को महागौरी के शांतिपूर्ण अवतार में पूजा जाता है। श्री शांतादुर्गा या संतेरी गोवा की संरक्षक देवी है। महाराष्ट्र में अंबाबाई और तुलजा भवानी के रूपों की पूजा की जाती है।आमतौर पर, भारत में अन्नपूर्णा और ललिता-महात्रिपुरसुंदरी के दो पहलुओं की पूजा की जाती है। श्री शंकर ने अन्नपूर्णा के रूप में दिव्य माँ की शक्ति, सुंदरता और महिमा की प्रशंसा करते हुए एक भक्तिपूर्ण भजन की रचना की, “अन्न का दाता।” `भोजन ‘सांसारिक व्यक्तियों और साधकों या आध्यात्मिक आकांक्षाओं के लिए समान रूप से माँ का वरदान है।भारत में दुर्गा मंदिरभारत में देवी दुर्गा के सबसे उल्लेखनीय मंदिर कोल्हापुर, महाराष्ट्र में अंबाबाई मंदिर, उत्तर कन्नड़ जिले, कर्नाटक में दुर्गम्बा मंदिर; छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में माँ बम्लेश्वरी मंदिर, कोलकाता में कालीघाट मंदिर; उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कुलंजरी माता मंदिर; कनक दुर्गा मंदिर, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश; पटना, बिहार में शीतला माता मंदिर; गोवा में शांता दुर्गा मंदिर; माउंट आबू, राजस्थान के पास अंबिका माता मंदिर; तुलजापुर, महाराष्ट्र में तुलजा भवानी मंदिर; बिरजा मंदिर जाजपुर, उड़ीसा में और कई अन्य मंदिर हैं।

दुर्गा माँ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब देवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया। परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति औ...