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दुर्गासप्तशती अर्थ सहित श्री शिवस्तोत्र अर्थ सहित <<<< दुर्गा सप्तशती अध्याय 12 (Durga Saptashati – 12 By वनिता कासनियां पंजाब दुर्गा सप्तशती अध्याय , दुर्गा सप्तशती अध्याय 13 में, सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों में से इस अध्याय में 29 श्लोक आते हैं। इस पोस्ट से सम्बन्धित ,एक महत्वपूर्ण बात इस लेख में दुर्गा सप्तशती अध्याय 13 के सभी 29 श्लोक अर्थ सहित दिए गए हैं। अध्याय सिर्फ हिन्दी में सम्पूर्ण अध्याय 13 सिर्फ हिंदी में पढ़ने के लिए, अर्थात सभी श्लोक हाईड (hide) करने के लिए क्लिक करें अध्याय श्लोक अर्थ सहित इस अध्याय के सभी श्लोक अर्थ सहित पढ़ने के लिए (यानी की सभी श्लोक unhide या show करने के लिए) क् साथ ही साथ हर श्लोक के स्थान पर एक छोटा सा arrow है, जिसे क्लिक करने पर, वह श्लोक दिखाई देगा। और सभी श्लोक हाईड और शो (दिखाने) के लिए भी लिंक दी गयी है। माँ दुर्गा को नमस्कार ॥ध्यानम्॥ ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्। पाशाङ्‌कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥ ध्यान जो उदयकालके सूर्यमण्डलकी-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं, जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, वर एवं अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं, उन शिवादेवीका मैं ध्यान करता (करती) हूँ। कल्याणदायिनी माँ शिवा को प्रणाम सभी श्लोक – Hide | Show ॐ ऋषिरुवाच॥१॥ एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्। एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत्॥२॥ मेधा ऋषि कहते हैं – राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया, जो इस जगत को धारण करती हैं, उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है। सभी श्लोक – Hide | Show विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया। तया त्वमेष वैश्‍यश्‍च तथैवान्ये विवेकिनः॥३॥ मोह्यन्ते मोहिताश्‍चैव मोहमेष्यन्ति चापरे। तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्‍वरीम्॥४॥ वे ही विद्या, उत्पन्न करती है। भगवान विष्णु की मायास्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा अन्यान्य विवेकी जन मोहित होते हैं, मोहित हुए हैं तथा आगे भी मोहित होंगे। महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाऒ। जगतजननी माँ भगवती को नमस्कार सभी श्लोक – Hide | Show आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा॥५॥ आराधना करने पर वे ही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं। सभी श्लोक – Hide | Show मार्कण्डेय उवाच॥६॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः॥७॥ प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्। निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च॥८॥ मार्कंडेयजी कहते हैं – मेधा मुनि के ये वचन सुनकर राजा सुरथ ने उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महाभाग महर्षि को प्रणाम किया। वे अत्यंत ममता और राज्य के छिन जाने से बहुत खिन्न हो चुके थे। सभी श्लोक – Hide | Show जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने। संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः॥९॥ महामुने! इसलिए विरक्त होकर राजा तथा वैश्य तत्काल तपस्या को चले गए और वे जगदम्बा के दर्शन के लिए नदी के तट पर रहकर तपस्या करने लगे। माँ जगदम्बा को प्रणाम हे देवी माँ, हमें सद्बुद्धि दो सभी श्लोक – Hide | Show स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्। तौ तस्मिन पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्॥१०॥ वे वैश्य उत्तम देवीसूक्त का जप करते हुए तपस्या में प्रवृत हुए। वे दोनों नदी के तटपर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप और हवन आदि के द्वारा उनकी आराधना करने लगे। माँ भवानी को नमस्कार सभी श्लोक – Hide | Show अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः। निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ॥११॥ उन्होंने पहले तो आहार को धीरे-धीरे कम किया। फिर बिलकुल निराहार रहकर देवी में ही मन लगाए एकाग्रता पूर्वक उनका चिंतन आरम्भ किया। सभी श्लोक – Hide | Show ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्। एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः॥१२॥ वे दोनों लगातार तीन वर्ष तक संयमपूर्वक आराधना करते रहे। अम्बा माता को प्रणाम सभी श्लोक – Hide | Show परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका॥१३॥ इसपर प्रसन्न होकर जगतको धारण करनेवाली चंडिका देवी ने दर्शन देकर कहा – सभी श्लोक – Hide | Show देव्युवाच॥१४॥ यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन। मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत्॥१५॥ देवी बोली – राजन्! तथा अपने कुल को आनंदित करने वाले वैश्य! तुम लोग जिस वस्तु की अभिलाषा रखते हो, वह मुझसे मांगो। मैं संतुष्ट हूं, अत: तुम्हें वह सब कुछ दूंगी। सभी श्लोक – Hide | Show मार्कण्डेय उवाच॥१६॥ ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्‍यन्यजन्मनि। अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥१७॥ मार्कंडेयजी कहते हैं – तब राजा ने दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य मांगा तथा इस जन्म में भी शत्रुऒं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके पुन: अपना राज्य प्राप्त कर लेने का वरदान मांगा। सभी श्लोक – Hide | Show सोऽपि वैश्‍यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः। ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्‌गविच्युतिकारकम्॥१८॥ वैश्य का चित्त संसार की ऒर से खिन्न एवं विरक्त हो चुका था और वे बड़े बुद्धिमान थे। अत: उस समय उन्होंने तो ममता और अहंता रूप आसक्ति का नाश करने वाला ज्ञान मांगा। सभी श्लोक – Hide | Show देव्युवाच॥१९॥ स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान्॥२०॥ देवी बोलीं – राजन्! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुऒं को मारकर अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। सभी श्लोक – Hide | Show हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति॥२१॥ अब वहां तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा। सभी श्लोक – Hide | Show मृतश्‍च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः॥२२॥ सावर्णिको नाम* मनुर्भवान् भुवि भविष्यति॥२३॥ फिर मृत्यु के पश्चात् तुम भगवान् विवस्वान (सूर्य) के अंश से जन्म लेकर इस पृथ्वी पर सावर्णिक मनु के नाम से विख्यात होऒगे। सभी श्लोक – Hide | Show वैश्‍यवर्य त्वया यश्‍च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः॥२४॥ वैश्यवर्य! तुमने भी जिस वर को मुझसे प्राप्त करने की इच्छा की है, उसे देती हूं। तुम्हें मोक्ष के लिए ज्ञान प्राप्त होगा। सभी श्लोक – Hide | Show मार्कण्डेय उवाच॥२६॥ इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम्॥२७॥ बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता। एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः॥२८॥ मार्कंडेयजी कहते हैं – इस प्रकार उन दोनों को मनोवांछित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर देवी अम्बिका तत्काल अंतर्धान हो गईं। सभी श्लोक – Hide | Show सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥२९॥ एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥क्लीं ॐ॥ इस तरह देवी से वरदान पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ सूर्य से जन्म ले सावर्णिक नामक मनु होंगे। सभी श्लोक – Hide | Show इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥१३॥ इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत देवी माहाम्य में सुरथ और वैश्य को वरदान नामक तेरहवां अध्याय पूरा हुआ दुर्गा सप्तशती अध्याय


By वनिता कासनियां पंजाब

दुर्गा सप्तशती अध्याय ,

दुर्गा सप्तशती अध्याय 13 में,
सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान

दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों में से इस अध्याय में 29 श्लोक आते हैं।


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और सभी श्लोक हाईड और शो (दिखाने) के लिए भी लिंक दी गयी है।

माँ दुर्गा को नमस्कार


॥ध्यानम्॥

ॐ बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्।
पाशाङ्‌कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥

ध्यान

जो उदयकालके सूर्यमण्डलकी-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं,
जिनके चार भुजाएँ और
तीन नेत्र हैं
तथा जो अपने हाथोंमें
पाश, अंकुश, वर एवं
अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं,
उन शिवादेवीका मैं ध्यान करता (करती) हूँ।


कल्याणदायिनी माँ शिवा को प्रणाम

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ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्।
एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत्॥२॥

मेधा ऋषि कहते हैं –

राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे
देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया,
जो इस जगत को धारण करती हैं,
उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है।

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विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया।
तया त्वमेष वैश्‍यश्‍च तथैवान्ये विवेकिनः॥३॥
मोह्यन्ते मोहिताश्‍चैव मोहमेष्यन्ति चापरे।
तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्‍वरीम्॥४॥

वे ही विद्या, उत्पन्न करती है।

भगवान विष्णु की मायास्वरूपा
उन भगवती के द्वारा ही
तुम, ये वैश्य तथा अन्यान्य विवेकी जन
मोहित होते हैं,
मोहित हुए हैं
तथा आगे भी मोहित होंगे।

महाराज!
तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाऒ।

जगतजननी माँ भगवती को नमस्कार

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आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा॥५॥

आराधना करने पर
वे ही मनुष्यों को भोग,
स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करती हैं।

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मार्कण्डेय उवाच॥६॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः॥७॥
प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्।
निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च॥८॥

मार्कंडेयजी कहते हैं –
मेधा मुनि के ये वचन सुनकर
राजा सुरथ ने उत्तम व्रत का पालन करने वाले

उन महाभाग महर्षि को प्रणाम किया।

वे अत्यंत ममता और
राज्य के छिन जाने से
बहुत खिन्न हो चुके थे।

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जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने।
संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः॥९॥

महामुने!
इसलिए विरक्त होकर राजा
तथा वैश्य तत्काल तपस्या को चले गए और
वे जगदम्बा के दर्शन के लिए
नदी के तट पर रहकर तपस्या करने लगे।

माँ जगदम्बा को प्रणाम
हे देवी माँ, हमें सद्बुद्धि दो

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स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्।
तौ तस्मिन पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम्॥१०॥

वे वैश्य
उत्तम देवीसूक्त का जप करते हुए
तपस्या में प्रवृत हुए।

वे दोनों नदी के तटपर
देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर
पुष्प, धूप और हवन आदि के द्वारा
उनकी आराधना करने लगे।

माँ भवानी को नमस्कार

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अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः।
निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ॥११॥

उन्होंने पहले तो
आहार को धीरे-धीरे कम किया।

फिर बिलकुल निराहार रहकर

देवी में ही मन लगाए
एकाग्रता पूर्वक
उनका चिंतन आरम्भ किया।

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ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्।
एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः॥१२॥

वे दोनों लगातार तीन वर्ष तक
संयमपूर्वक आराधना करते रहे।

अम्बा माता को प्रणाम


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परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका॥१३॥

इसपर प्रसन्न होकर
जगतको धारण करनेवाली
चंडिका देवी ने दर्शन देकर कहा –

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देव्युवाच॥१४॥
यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत्॥१५॥

देवी बोली –
राजन्!
तथा अपने कुल को आनंदित करने वाले वैश्य!
तुम लोग जिस वस्तु की अभिलाषा रखते हो,
वह मुझसे मांगो। मैं संतुष्ट हूं,
अत: तुम्हें वह सब कुछ दूंगी।

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मार्कण्डेय उवाच॥१६॥
ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्‍यन्यजन्मनि।
अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात्॥१७॥

मार्कंडेयजी कहते हैं –
तब राजा ने
दूसरे जन्म में नष्ट न होने वाला राज्य मांगा
तथा इस जन्म में भी शत्रुऒं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके
पुन: अपना राज्य प्राप्त कर लेने का वरदान मांगा।

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सोऽपि वैश्‍यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः।
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्‌गविच्युतिकारकम्॥१८॥

वैश्य का चित्त
संसार की ऒर से खिन्न एवं
विरक्त हो चुका था और
वे बड़े बुद्धिमान थे।

अत: उस समय उन्होंने तो
ममता और अहंता रूप
आसक्ति का नाश करने वाला
ज्ञान मांगा।

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देव्युवाच॥१९॥
स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान्॥२०॥

देवी बोलीं –
राजन्! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुऒं को मारकर
अपना राज्य प्राप्त कर लोगे।

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हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति॥२१॥

अब वहां तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा।

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मृतश्‍च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः॥२२॥
सावर्णिको नाम* मनुर्भवान् भुवि भविष्यति॥२३॥

फिर मृत्यु के पश्चात्
तुम भगवान् विवस्वान (सूर्य) के अंश से जन्म लेकर
इस पृथ्वी पर सावर्णिक मनु के नाम से विख्यात होऒगे।

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वैश्‍यवर्य त्वया यश्‍च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः॥२४॥

वैश्यवर्य!
तुमने भी जिस वर को
मुझसे प्राप्त करने की इच्छा की है,
उसे देती हूं।

तुम्हें मोक्ष के लिए ज्ञान प्राप्त होगा।

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मार्कण्डेय उवाच॥२६॥
इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम्॥२७॥
बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता।
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः॥२८॥

मार्कंडेयजी कहते हैं –
इस प्रकार उन दोनों को
मनोवांछित वरदान देकर तथा
उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर
देवी अम्बिका तत्काल अंतर्धान हो गईं।

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सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥२९॥
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः
सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः॥क्लीं ॐ॥

इस तरह देवी से वरदान पाकर
क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ
सूर्य से जन्म ले सावर्णिक नामक मनु होंगे।

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इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥१३॥

इस प्रकार श्रीमार्कंडेय पुराण में
सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत
देवी माहाम्य में सुरथ और वैश्य को वरदान नामक
तेरहवां अध्याय पूरा हुआ


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*❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️         🥀👣🥀जय माँ महागौरी🥀👣🥀            ⛳🕉️⛳शुभ दिन⛳🕉️⛳ * बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम * 🌹🙏🙏🌹 -------------------------------------------------------------------                        🌼‼️🙏‼️🌼 -------------------------------------------------------------------          🥀 श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।           🌀 महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥ "दुर्गा अष्टमी की समस्त माँ भक्तो को हार्दिक शुभकामनाएं" 💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥 * *आज माता का अष्टम स्वरूप माँ महागौरी के श्री चरणों में नमन करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि माताआप सभी को सुख-शांति व आरोग्य प्रदान करे * *।

दुर्गा माँBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबदेवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया।परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति और गतिविधियों की चर्चा देवी महात्म्यम में आगे की गई है। दुर्गा, भगवान शिव की पत्नी पार्वती का एक और पहलू है। देवी काली को उनके अवतारों में से एक माना जाता है। उन्हें दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती की माँ के रूप में चित्रित किया जाता है, जिन्हें अश्विन के महीने में मनाया जाने वाला नवरात्रि भी कहा जाता है।देवी दुर्गा की उत्पत्तिदेवी महात्म्यम के अनुसार, देवी दुर्गा का गठन असुर महिष से लड़ने के लिए एक योद्धा देवी के रूप में किया गया था। दानव ने पृथ्वी, स्वर्ग और नरक को आतंकित कर दिया था और देवता उसे हराने में विफल रहे क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक पुरुष द्वारा पराजित नहीं होने का वरदान दिया था। ब्रह्मा के नेतृत्व में देवताओं ने विष्णु और शिव से मदद के लिए संपर्क किया। पवित्र त्रिमूर्ति ने तब अपनी दिव्य चमक को एकजुट किया और देवी दुर्गा प्रकट हुईं। वह महिषासुर का सफाया करने और सभी दिव्य प्राणियों को बचाने के लिए उभरी थी। उसने शिव के त्रिशूल, विष्णु के चक्र, ब्रह्मा के कमंडलु, इंद्र के वज्र, कुबेर के रत्नहार आदि विभिन्न देवताओं से अपने हथियार प्राप्त किए।बाल वनिता महिला आश्रमराक्षसी महिषासुर ने उन दोनों के बीच एक लड़ाई में उसके बदलते रूपों के खिलाफ एक उग्र लड़ाई लड़ी, लेकिन आखिरकारदुर्गा माँ ने उसका वाढ कर दिया। इस प्रकार, वह महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी जानी जाती है – महिषासुर का वध करने वाली।अपने विभिन्न पहलुओं में देवी की पूजा शरद ऋतु में की जाती है, जो बंगाल में फसल के मौसम के उद्घाटन का प्रतीक है। दुर्गा की शरदकालीन पूजा में, उनका पहला प्रतिनिधि बिल्व वृक्ष की एक शाखा है। दूसरे चरण में प्रतिनिधि नवपात्रिका है – मादा वृक्ष, अन्य पौधों और जड़ी-बूटियों के पेड़ के साथ बनाया गया। इसके अलावा मां को अक्सर चावल (धान्यरूप) के साथ पूजा में पहचाना जाता है। दुर्गा का एक उपपत्नी शाकाम्वरी है, अर्थात जड़ी-बूटी पौष्टिक देवी।देवी दुर्गा की कथादेवी दुर्गा को देवी का अवतार माना जाता है जिसके कई रूप हैं। देवी कई किंवदंतियों से जुड़ी हुई हैं जैसे कि पार्वती और भगवान शिव की कथा, रावण, शिव और पार्वती की कथा, भगवान राम और दुर्गा की कथा और विष्णु की पौराणिक कथा पार्वती की कथा।देवी दुर्गा के अवतारदेवी दुर्गा के कई अवतार और अवतार हैं, जैसे गौरी, भवानी, ललिता, कमंडलिनी, राजेश्वरी, जावा आदि। इनके अलावा, उनके 9 अन्य पदनाम भी हैं जिन्हें नव दुर्गा, ब्रह्मचारिणी, शैलपुत्री, चंद्रघंटा, कालरात्रि, स्कंदमाता, सिद्धिदात्री, महागौरी, कुसुमंदा और कात्यायनी के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गा के अन्य अवतारों में पार्वती, करुणामयी, अंबिका और काली शामिल हैं।देवी दुर्गा की विशेषताएँ और प्रतीकआमतौर पर, देवी दुर्गा को लाल रंग के कपड़े (साड़ी) पहनाया जाता है, जहां रंग लाल कार्रवाई और बुराई से सुरक्षा का प्रतीक है। उसे कई वस्तुओं को ले जाने वाली 10 या 8 भुजाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जो हिंदू धर्म में 10 दिशाओं या 8 चौकों का प्रतीक है, जो यह भी दर्शाता है कि वह भक्तों को सभी दिशाओं से बचाता है। दुर्गा को 3 आँखें होने के रूप में भी चित्रित किया गया है और इस प्रकार, उन्हें त्रयम्बक भी कहा जाता है जिसका अर्थ है 3 आँखें देवी। दाईं आंख सूर्य द्वारा प्रतीक कार्रवाई का प्रतीक है, बाईं आंख चंद्रमा की ओर संकेत करती है; और केंद्रीय नेत्र अग्नि के प्रतीक ज्ञान को दर्शाता है।पूँजीवादी पितृसत्ता एक साथ निजीकरण और मातृत्व से प्यार करने वाली माताओं और स्वस्थ शिशुओं के संस्थागतकरण की है। गंगा के डेल्टा में बंगालियों की विशिष्ट पहचान के रूप में उभरने के साथ, टेंडर मदरहुड की भावना की पुष्टि प्राकृतिक सेटिंग में हुई, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इतनी स्पष्ट रूप से अच्छी तरह से पानी और उपजाऊ (सुजलान सुपहलंग, शस्यश्यामलांग) बताया। मिट्टी की प्राकृतिक इनाम ने एक स्नेही माँ के रूप में बंगाल के प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित किया, जो अपने बच्चों की मांगों का जवाब देने के लिए तैयार थी। धार्मिक दुर्जनों के अलावा, देवी दुर्गा राष्ट्रवाद और अर्थव्यवस्था के स्तंभों के बीच अपने मावेरिक्स का नक्शा बनाती हैं। वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी देवता है।शेर या बाघ को आमतौर पर दुर्गा के वाहन के रूप में देखा जाता है। सिंह में शक्ति, दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति को दर्शाया गया है। शेर की सवारी करने वाली देवी दुर्गा इन गुणों पर उनकी विशेषज्ञता का प्रतीक हैं। दुर्गा को अभय मुद्रा स्थिति में शेर पर देखा जाता है, जो भय से मुक्ति का प्रमाण देता है। एक जीव में सभी कोशिकाओं का कुल योग एक व्यक्ति होता है, इसलिए प्रत्येक कोशिका एक कोशिका की तरह होती है और उनका योग भगवान होता है और उससे परे वह निरपेक्ष होता है।देवी दुर्गा के अस्त्र शस्त्रदेवी दुर्गा के पास कई अस्त्र शस्त्र हैं। उसके हाथ में शंख डरा हुआ ओम या प्रणव का प्रतिनिधित्व करता है; वज्र दृढ़ता का प्रतिनिधित्व करता है; धनुष और तीर ऊर्जा का प्रतीक है; सुदर्शन चक्र जो उंगली पर घूमता है, यह दर्शाता है कि पूरी दुनिया उसके लिए आज्ञाकारी है और उसकी आज्ञा पर है; देवी दुर्गा द्वारा रखी गई तलवार ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है जो संदेह से बंधी नहीं है; त्रिशूल या त्रिशूल 3 अलग-अलग गुणों का प्रतीक है, राजस (गतिविधि), सतवा (निष्क्रियता) और तमस (गैर-गतिविधि)। वह मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक अर्थात् दुखों के 3 रूपों का उन्मूलनकर्ता भी है। देवी दुर्गा द्वारा धारण किया गया कमल, पूरी तरह से फूला नहीं समाता, सफलता का आश्वासन देता है, लेकिन अंतिमता नहीं।देवी दुर्गा की पूजादेवी दुर्गा की पूजा पूरे देश में की जाती है। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, झारखंड और बिहार में प्रमुख वार्षिक त्योहार है। महिषासुर पर दुर्गा की विजय दशहरे के रूप में मनाई जाती है, जिसे बंगाली में विजयदशमी के रूप में भी जाना जाता है। दशहरा को उत्तर भारत में रावण के खिलाफ राम की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को कश्मीर में शारिका के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि भक्ति के दौरान शक्ति उपासक देवी के 9 पहलुओं पर ध्यान करते हैं, जिन्हें नव दुर्गा के रूप में जाना जाता है। दशहरा नवरात्रि दक्षिण भारत में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को मैसूर में चामुंडेश्वरी कहा जाता है।नवरात्रि पूरे गुजरात में मनाई जाती है और अंतिम दिन महिषासुरमर्दिनी की विजय के उपलक्ष्य में गरबा का आयोजन किया जाता है। गोवा में, देवी दुर्गा को महागौरी के शांतिपूर्ण अवतार में पूजा जाता है। श्री शांतादुर्गा या संतेरी गोवा की संरक्षक देवी है। महाराष्ट्र में अंबाबाई और तुलजा भवानी के रूपों की पूजा की जाती है।आमतौर पर, भारत में अन्नपूर्णा और ललिता-महात्रिपुरसुंदरी के दो पहलुओं की पूजा की जाती है। श्री शंकर ने अन्नपूर्णा के रूप में दिव्य माँ की शक्ति, सुंदरता और महिमा की प्रशंसा करते हुए एक भक्तिपूर्ण भजन की रचना की, “अन्न का दाता।” `भोजन ‘सांसारिक व्यक्तियों और साधकों या आध्यात्मिक आकांक्षाओं के लिए समान रूप से माँ का वरदान है।भारत में दुर्गा मंदिरभारत में देवी दुर्गा के सबसे उल्लेखनीय मंदिर कोल्हापुर, महाराष्ट्र में अंबाबाई मंदिर, उत्तर कन्नड़ जिले, कर्नाटक में दुर्गम्बा मंदिर; छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में माँ बम्लेश्वरी मंदिर, कोलकाता में कालीघाट मंदिर; उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कुलंजरी माता मंदिर; कनक दुर्गा मंदिर, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश; पटना, बिहार में शीतला माता मंदिर; गोवा में शांता दुर्गा मंदिर; माउंट आबू, राजस्थान के पास अंबिका माता मंदिर; तुलजापुर, महाराष्ट्र में तुलजा भवानी मंदिर; बिरजा मंदिर जाजपुर, उड़ीसा में और कई अन्य मंदिर हैं।

दुर्गा माँ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब देवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया। परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति औ...