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संवरण और ताप्ती की कथा - एक सम्राट जिसने एक स्त्री के लिए सब कुछ छोड़ दिया By वनिता कासनियां पंजाब संवरण एक चंद्रवंशी सम्राट थे जो महाराज हस्ती (जिनके नाम पर हस्तिनापुर है) के पड़पोते और महाराज अजमीढ़ के पुत्र थे। अपने पूर्वजों की भांति ही संवरण एक महान राजा साबित हुए जो अपनी प्रजा के सुख के लिए कुछ भी कर सकते थे। उनके राज्य में प्रजा सुखपूर्वक और निर्भय होकर निवास कर रही थी।संवरण भगवान सूर्यनारायण के अनन्य भक्त थे। प्रतिदिन जब तक वे सूर्योपासना नहीं कर लेते थे, अपने कंठ से जल की एक बून्द भी नहीं उतारते थे। एक बार वे अकेले ही आखेट के लिए निकल गए और वन में भटक गए। उसी दौरान उन्होंने सरोवर के पास एक स्त्री को देखा। उस स्त्री का सौंदर्य ऐसा था कि सहस्त्रों अप्सराएं भी उसके समक्ष फीकी लगे।उस अद्भुत सुंदरी को देख कर संवरण उसके पास पहुंचे और उससे कहा कि "हे सुंदरी! तुम कौन हो? मैंने आज तक तुम्हारे जैसी रूपवान स्त्री नहीं देखी। तुम्हे देख कर मैं और कुछ नहीं सोच पा रहा। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी? मैं हस्तिनापुर नरेश संवरण हूँ। ये सारा संसार मेरे अधिकार में है और मैं तुम्हे वचन देता हूँ कि मैं तुम्हे सदा प्रसन्न रखूँगा। अतः मेरा प्रणय निवेदन स्वीकार करो और इस पृथ्वी की महारानी बन सुख भोगो।"उस स्त्री ने एक क्षण संवरण को देखा और फिर अचानक अदृश्य हो गयी। अब तो संवरण उसकी याद में जल बिन मछली की भांति तड़पने लगे। वे पागलों की तरह वन-वन भटकने लगे और उस स्त्री को पुकारने लगे। उनकी ऐसी दशा देख कर वो स्त्री पुनः उनके पास आयी और कहा - "हे महाराज! मेरा नाम ताप्ती है और मैं सूर्यदेव की कन्या हूँ। आपको देख कर मेरे मन में भी आपको अपने पति के रूप में पाने की इच्छा है किन्तु मैं अपने पिता के अधीन हूँ। अतः यदि आप मुझे प्राप्त करना चाहते हैं तो मुझे मरे पिता से मांगिये।" ये कह कर वो पुनः अदृश्य हो गयी।अब तो संवरण पुनः विक्षिप्त हो यहाँ-वहाँ भटकने लगे। अंत में वे अपनी चेतना खो कर गिर पड़े। बहुत काल के बाद जब वे चेत हुए तो उन्हें पुनः ताप्ती की याद आयी। उन्होंने निश्चय किया कि वे तप कर सूर्यदेव को प्रसन्न करेंगे और ताप्ती को प्राप्त करेंगे। सूर्यभक्त तो वे थे ही, उन्होंने भगवान सूर्यनारायण की घोर तपस्या की। उनका तप इतना भीषण था कि उसका ताप स्वयं सूर्यदेव तक पहुँच गया।संवरण की परीक्षा लेने के लिए सूर्यदेव ने उसकी तपस्या को तोड़ने के लिए उसके कान में कहा - "हे प्रतापी राजा, तुम यहाँ तप कर रहे हो और वहां तुम्हारी प्रजा धीरे-धीरे काल के गाल में समा रही है।" ये सुनने के बाद भी संवरण का तप जब नहीं टूटा तो उन्होंने फिर कहा "तुम्हारा परिवार और बन्धु-बांधव भी काल कलवित हो रहे हैं।" फिर भी संवरण तप में लीन रहे तो सूर्यदेव ने अंतिम बार कहा - "तुम्हारे राज्य में अकाल पड़ा है और मनुष्य क्या, पशु, पक्षी और वृक्ष भी सूख गए हैं।" इतना सुनने के बाद भी संवरण तप में लीन रहे।उसका ऐसा हठ देख कर सूर्यदेव प्रसन्न हुए और उसे अपने दर्शन दिए। उन्होंने संवरण से पूछा कि उसे क्या चाहिए। तब संवरण ने कहा - "हे भगवन! मुझे केवल आपकी पुत्री ताप्ती अपनी पत्नी के रूप में चाहिए।" ये सुनकर सूर्यदेव ने कहा कि "हे राजन! यदि तुम ताप्ती को पत्नी के रूप में प्राप्त कर लोगे तो वो सभी बातें सत्य हो जाएंगी जो मैंने तुमसे तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए कहा था। अब बताओ क्या तुम अब भी ताप्ती को पाना चाहते हो?"संवरण ने कहा - "हे प्रभु! मुझे आपकी पुत्री ताप्ती के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए।" ये सुनकर सूर्यदेव ने ताप्ती का विवाह संवरण से कर दिया और दोनों सब कुछ भूल कर उसी वन में सुखपूर्वक रहने लगे। उधर सूर्यदेव के कथनानुसार संवरण के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी। संवरण के वृद्ध मंत्री ये जानते थे कि राज्य के राजा का इतने दिनों तक अनुपस्थित रहना ही इस अकाल का कारण है, इसीलिए वे उन्हें खोजने को निकल पड़े।कुछ समय बाद अंततः उन्हें राजा संवरण के दर्शन हुए। उन्होंने संवरण को बहुत बार समझाया कि उनके राज्य की स्थिति अत्यंत विकट है उन्हें तत्काल वापस चलना चाहिए, किन्तु ताप्ती के प्रेम में अंधे बने संवरण किसी भी स्थिति में वापस नहीं लौटना चाहते थे। उनके मंत्री समझ गए कि वे एक स्त्री के मोहजाल में फंसे हुए हैं इसीलिए उन्होंने एक चित्रकार से बहुत सारे चित्र बनवाये और उसे एक पुस्तक का रूप देकर संवरण की भेंट किया।जब संवरण ने उस पुस्तक को खोला तो उन चित्रों को देख कर दहल गए। किसी चित्र में मनुष्यों को मरते हुए दिखाया गया था, किसी में पशु एक दूसरे को नोच रहे थे। एक चित्र में माता अपने पुत्र को स्वयं कुएं में फेंक रही थी ताकि वो भूख से तड़प-तड़प कर मरने के बजाय सरलता से मृत्यु को प्राप्त हो। संवरण ने उन वीभत्स दृश्यों को देख कर भय से अपने नेत्र बंद कर लिए।उन्होंने अपने मंत्री से पूछा - "ये किस राज्य का दृश्य है? उसका राजा कौन है? धिक्कार है ऐसे राजा पर जो अपनी प्रजा को इस हाल में छोड़ गया है।" तब उनके मंत्री ने कहा - "हे महाराज! इस राज्य का नाम हस्तिनापुर है और उसके सम्राट का नाम संवरण है।" जब संवरण ने ये सुना तो अवाक् रह गया।वो बार बार स्वयं को धिक्कारने लगे कि उनके कारण प्रजा की ये दशा हो गयी है। वे तत्काल ताप्ती को लेकर हस्तिनापुर पहुंचे। जब देवराज इंद्र ने देखा कि वे पुनः हस्तिनापुर लौट आये हैं तो उन्होंने तत्काल वहां वर्षा की जिससे दुर्भिक्ष समाप्त हो गया और प्रजा पुनः वैभवशाली हो गयी। उसके बाद संवरण और ताप्ती ने बहुत काल तक हस्तिनापुर पर शासन किया।बाद में जब महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र की प्रतिद्वंदिता के कारण प्रसिद्ध "दशराज युद्ध" हुआ तो दशराज की सेना महाराज संवरण के नेतृत्व में ही महाराज सुदास से लड़ी। किन्तु अंततः दशराज के युद्ध में सुदास विजित हुए और संवरण और अन्य नौ राजाओं की पराजय हुई। हस्तिनापुर साम्राज्य बिखर गया।उसे पुनः प्राप्त करने के लिए देवताओं के आशीर्वाद से संवरण और ताप्ती के पुत्र के रूप में कुरु का जन्म हुआ। वे आगे चलकर हस्तिनापुर के सम्राट बने और उन्होंने अपने प्रताप से सभी राजाओं को परास्त कर अपना राज्य पुनः प्राप्त किया। कुरु ने अपने राज्य की सीमा अनंत तक बढ़ाई और उनके प्रताप के कारण ही उनका कुल कुरुकुल कहलाया। उन्ही के नाम पर सम्यक पंचक नाम का स्थान कुरुक्षेत्र कहलाया जहाँ महाभारत का युद्ध हुआ।Story of Samvaran and Tapti - an emperor who gave up everything for a woman By Vnita Kasnia Punjab Samvaran was a Chandravanshi emperor who was the great-grandson of Maharaj Hasti (whose name is Hastinapur) and Maharaja Ajam.

संवरण और ताप्ती की कथा - एक सम्राट जिसने एक स्त्री के लिए सब कुछ छोड़ दिया

संवरण एक चंद्रवंशी सम्राट थे जो महाराज हस्ती (जिनके नाम पर हस्तिनापुर है) के पड़पोते और महाराज अजमीढ़ के पुत्र थे। अपने पूर्वजों की भांति ही संवरण एक महान राजा साबित हुए जो अपनी प्रजा के सुख के लिए कुछ भी कर सकते थे। उनके राज्य में प्रजा सुखपूर्वक और निर्भय होकर निवास कर रही थी।

संवरण भगवान सूर्यनारायण के अनन्य भक्त थे। प्रतिदिन जब तक वे सूर्योपासना नहीं कर लेते थे, अपने कंठ से जल की एक बून्द भी नहीं उतारते थे। एक बार वे अकेले ही आखेट के लिए निकल गए और वन में भटक गए। उसी दौरान उन्होंने सरोवर के पास एक स्त्री को देखा। उस स्त्री का सौंदर्य ऐसा था कि सहस्त्रों अप्सराएं भी उसके समक्ष फीकी लगे।

उस अद्भुत सुंदरी को देख कर संवरण उसके पास पहुंचे और उससे कहा कि "हे सुंदरी! तुम कौन हो? मैंने आज तक तुम्हारे जैसी रूपवान स्त्री नहीं देखी। तुम्हे देख कर मैं और कुछ नहीं सोच पा रहा। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी? मैं हस्तिनापुर नरेश संवरण हूँ। ये सारा संसार मेरे अधिकार में है और मैं तुम्हे वचन देता हूँ कि मैं तुम्हे सदा प्रसन्न रखूँगा। अतः मेरा प्रणय निवेदन स्वीकार करो और इस पृथ्वी की महारानी बन सुख भोगो।"


उस स्त्री ने एक क्षण संवरण को देखा और फिर अचानक अदृश्य हो गयी। अब तो संवरण उसकी याद में जल बिन मछली की भांति तड़पने लगे। वे पागलों की तरह वन-वन भटकने लगे और उस स्त्री को पुकारने लगे। उनकी ऐसी दशा देख कर वो स्त्री पुनः उनके पास आयी और कहा - "हे महाराज! मेरा नाम ताप्ती है और मैं सूर्यदेव की कन्या हूँ। आपको देख कर मेरे मन में भी आपको अपने पति के रूप में पाने की इच्छा है किन्तु मैं अपने पिता के अधीन हूँ। अतः यदि आप मुझे प्राप्त करना चाहते हैं तो मुझे मरे पिता से मांगिये।" ये कह कर वो पुनः अदृश्य हो गयी।

अब तो संवरण पुनः विक्षिप्त हो यहाँ-वहाँ भटकने लगे। अंत में वे अपनी चेतना खो कर गिर पड़े। बहुत काल के बाद जब वे चेत हुए तो उन्हें पुनः ताप्ती की याद आयी। उन्होंने निश्चय किया कि वे तप कर सूर्यदेव को प्रसन्न करेंगे और ताप्ती को प्राप्त करेंगे। सूर्यभक्त तो वे थे ही, उन्होंने भगवान सूर्यनारायण की घोर तपस्या की। उनका तप इतना भीषण था कि उसका ताप स्वयं सूर्यदेव तक पहुँच गया।

संवरण की परीक्षा लेने के लिए सूर्यदेव ने उसकी तपस्या को तोड़ने के लिए उसके कान में कहा - "हे प्रतापी राजा, तुम यहाँ तप कर रहे हो और वहां तुम्हारी प्रजा धीरे-धीरे काल के गाल में समा रही है।" ये सुनने के बाद भी संवरण का तप जब नहीं टूटा तो उन्होंने फिर कहा "तुम्हारा परिवार और बन्धु-बांधव भी काल कलवित हो रहे हैं।" फिर भी संवरण तप में लीन रहे तो सूर्यदेव ने अंतिम बार कहा - "तुम्हारे राज्य में अकाल पड़ा है और मनुष्य क्या, पशु, पक्षी और वृक्ष भी सूख गए हैं।" इतना सुनने के बाद भी संवरण तप में लीन रहे।

उसका ऐसा हठ देख कर सूर्यदेव प्रसन्न हुए और उसे अपने दर्शन दिए। उन्होंने संवरण से पूछा कि उसे क्या चाहिए। तब संवरण ने कहा - "हे भगवन! मुझे केवल आपकी पुत्री ताप्ती अपनी पत्नी के रूप में चाहिए।" ये सुनकर सूर्यदेव ने कहा कि "हे राजन! यदि तुम ताप्ती को पत्नी के रूप में प्राप्त कर लोगे तो वो सभी बातें सत्य हो जाएंगी जो मैंने तुमसे तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए कहा था। अब बताओ क्या तुम अब भी ताप्ती को पाना चाहते हो?"

संवरण ने कहा - "हे प्रभु! मुझे आपकी पुत्री ताप्ती के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए।" ये सुनकर सूर्यदेव ने ताप्ती का विवाह संवरण से कर दिया और दोनों सब कुछ भूल कर उसी वन में सुखपूर्वक रहने लगे। उधर सूर्यदेव के कथनानुसार संवरण के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी। संवरण के वृद्ध मंत्री ये जानते थे कि राज्य के राजा का इतने दिनों तक अनुपस्थित रहना ही इस अकाल का कारण है, इसीलिए वे उन्हें खोजने को निकल पड़े।

कुछ समय बाद अंततः उन्हें राजा संवरण के दर्शन हुए। उन्होंने संवरण को बहुत बार समझाया कि उनके राज्य की स्थिति अत्यंत विकट है उन्हें तत्काल वापस चलना चाहिए, किन्तु ताप्ती के प्रेम में अंधे बने संवरण किसी भी स्थिति में वापस नहीं लौटना चाहते थे। उनके मंत्री समझ गए कि वे एक स्त्री के मोहजाल में फंसे हुए हैं इसीलिए उन्होंने एक चित्रकार से बहुत सारे चित्र बनवाये और उसे एक पुस्तक का रूप देकर संवरण की भेंट किया।

जब संवरण ने उस पुस्तक को खोला तो उन चित्रों को देख कर दहल गए। किसी चित्र में मनुष्यों को मरते हुए दिखाया गया था, किसी में पशु एक दूसरे को नोच रहे थे। एक चित्र में माता अपने पुत्र को स्वयं कुएं में फेंक रही थी ताकि वो भूख से तड़प-तड़प कर मरने के बजाय सरलता से मृत्यु को प्राप्त हो। संवरण ने उन वीभत्स दृश्यों को देख कर भय से अपने नेत्र बंद कर लिए।

उन्होंने अपने मंत्री से पूछा - "ये किस राज्य का दृश्य है? उसका राजा कौन है? धिक्कार है ऐसे राजा पर जो अपनी प्रजा को इस हाल में छोड़ गया है।" तब उनके मंत्री ने कहा - "हे महाराज! इस राज्य का नाम हस्तिनापुर है और उसके सम्राट का नाम संवरण है।" जब संवरण ने ये सुना तो अवाक् रह गया।

वो बार बार स्वयं को धिक्कारने लगे कि उनके कारण प्रजा की ये दशा हो गयी है। वे तत्काल ताप्ती को लेकर हस्तिनापुर पहुंचे। जब देवराज इंद्र ने देखा कि वे पुनः हस्तिनापुर लौट आये हैं तो उन्होंने तत्काल वहां वर्षा की जिससे दुर्भिक्ष समाप्त हो गया और प्रजा पुनः वैभवशाली हो गयी। उसके बाद संवरण और ताप्ती ने बहुत काल तक हस्तिनापुर पर शासन किया।

बाद में जब महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र की प्रतिद्वंदिता के कारण प्रसिद्ध "दशराज युद्ध" हुआ तो दशराज की सेना महाराज संवरण के नेतृत्व में ही महाराज सुदास से लड़ी। किन्तु अंततः दशराज के युद्ध में सुदास विजित हुए और संवरण और अन्य नौ राजाओं की पराजय हुई। हस्तिनापुर साम्राज्य बिखर गया।

उसे पुनः प्राप्त करने के लिए देवताओं के आशीर्वाद से संवरण और ताप्ती के पुत्र के रूप में कुरु का जन्म हुआ। वे आगे चलकर हस्तिनापुर के सम्राट बने और उन्होंने अपने प्रताप से सभी राजाओं को परास्त कर अपना राज्य पुनः प्राप्त किया। कुरु ने अपने राज्य की सीमा अनंत तक बढ़ाई और उनके प्रताप के कारण ही उनका कुल कुरुकुल कहलाया। उन्ही के नाम पर सम्यक पंचक नाम का स्थान कुरुक्षेत्र कहलाया जहाँ महाभारत का युद्ध हुआ।

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दुर्गा माँBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबदेवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया।परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति और गतिविधियों की चर्चा देवी महात्म्यम में आगे की गई है। दुर्गा, भगवान शिव की पत्नी पार्वती का एक और पहलू है। देवी काली को उनके अवतारों में से एक माना जाता है। उन्हें दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती की माँ के रूप में चित्रित किया जाता है, जिन्हें अश्विन के महीने में मनाया जाने वाला नवरात्रि भी कहा जाता है।देवी दुर्गा की उत्पत्तिदेवी महात्म्यम के अनुसार, देवी दुर्गा का गठन असुर महिष से लड़ने के लिए एक योद्धा देवी के रूप में किया गया था। दानव ने पृथ्वी, स्वर्ग और नरक को आतंकित कर दिया था और देवता उसे हराने में विफल रहे क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक पुरुष द्वारा पराजित नहीं होने का वरदान दिया था। ब्रह्मा के नेतृत्व में देवताओं ने विष्णु और शिव से मदद के लिए संपर्क किया। पवित्र त्रिमूर्ति ने तब अपनी दिव्य चमक को एकजुट किया और देवी दुर्गा प्रकट हुईं। वह महिषासुर का सफाया करने और सभी दिव्य प्राणियों को बचाने के लिए उभरी थी। उसने शिव के त्रिशूल, विष्णु के चक्र, ब्रह्मा के कमंडलु, इंद्र के वज्र, कुबेर के रत्नहार आदि विभिन्न देवताओं से अपने हथियार प्राप्त किए।बाल वनिता महिला आश्रमराक्षसी महिषासुर ने उन दोनों के बीच एक लड़ाई में उसके बदलते रूपों के खिलाफ एक उग्र लड़ाई लड़ी, लेकिन आखिरकारदुर्गा माँ ने उसका वाढ कर दिया। इस प्रकार, वह महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी जानी जाती है – महिषासुर का वध करने वाली।अपने विभिन्न पहलुओं में देवी की पूजा शरद ऋतु में की जाती है, जो बंगाल में फसल के मौसम के उद्घाटन का प्रतीक है। दुर्गा की शरदकालीन पूजा में, उनका पहला प्रतिनिधि बिल्व वृक्ष की एक शाखा है। दूसरे चरण में प्रतिनिधि नवपात्रिका है – मादा वृक्ष, अन्य पौधों और जड़ी-बूटियों के पेड़ के साथ बनाया गया। इसके अलावा मां को अक्सर चावल (धान्यरूप) के साथ पूजा में पहचाना जाता है। दुर्गा का एक उपपत्नी शाकाम्वरी है, अर्थात जड़ी-बूटी पौष्टिक देवी।देवी दुर्गा की कथादेवी दुर्गा को देवी का अवतार माना जाता है जिसके कई रूप हैं। देवी कई किंवदंतियों से जुड़ी हुई हैं जैसे कि पार्वती और भगवान शिव की कथा, रावण, शिव और पार्वती की कथा, भगवान राम और दुर्गा की कथा और विष्णु की पौराणिक कथा पार्वती की कथा।देवी दुर्गा के अवतारदेवी दुर्गा के कई अवतार और अवतार हैं, जैसे गौरी, भवानी, ललिता, कमंडलिनी, राजेश्वरी, जावा आदि। इनके अलावा, उनके 9 अन्य पदनाम भी हैं जिन्हें नव दुर्गा, ब्रह्मचारिणी, शैलपुत्री, चंद्रघंटा, कालरात्रि, स्कंदमाता, सिद्धिदात्री, महागौरी, कुसुमंदा और कात्यायनी के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गा के अन्य अवतारों में पार्वती, करुणामयी, अंबिका और काली शामिल हैं।देवी दुर्गा की विशेषताएँ और प्रतीकआमतौर पर, देवी दुर्गा को लाल रंग के कपड़े (साड़ी) पहनाया जाता है, जहां रंग लाल कार्रवाई और बुराई से सुरक्षा का प्रतीक है। उसे कई वस्तुओं को ले जाने वाली 10 या 8 भुजाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जो हिंदू धर्म में 10 दिशाओं या 8 चौकों का प्रतीक है, जो यह भी दर्शाता है कि वह भक्तों को सभी दिशाओं से बचाता है। दुर्गा को 3 आँखें होने के रूप में भी चित्रित किया गया है और इस प्रकार, उन्हें त्रयम्बक भी कहा जाता है जिसका अर्थ है 3 आँखें देवी। दाईं आंख सूर्य द्वारा प्रतीक कार्रवाई का प्रतीक है, बाईं आंख चंद्रमा की ओर संकेत करती है; और केंद्रीय नेत्र अग्नि के प्रतीक ज्ञान को दर्शाता है।पूँजीवादी पितृसत्ता एक साथ निजीकरण और मातृत्व से प्यार करने वाली माताओं और स्वस्थ शिशुओं के संस्थागतकरण की है। गंगा के डेल्टा में बंगालियों की विशिष्ट पहचान के रूप में उभरने के साथ, टेंडर मदरहुड की भावना की पुष्टि प्राकृतिक सेटिंग में हुई, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इतनी स्पष्ट रूप से अच्छी तरह से पानी और उपजाऊ (सुजलान सुपहलंग, शस्यश्यामलांग) बताया। मिट्टी की प्राकृतिक इनाम ने एक स्नेही माँ के रूप में बंगाल के प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित किया, जो अपने बच्चों की मांगों का जवाब देने के लिए तैयार थी। धार्मिक दुर्जनों के अलावा, देवी दुर्गा राष्ट्रवाद और अर्थव्यवस्था के स्तंभों के बीच अपने मावेरिक्स का नक्शा बनाती हैं। वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी देवता है।शेर या बाघ को आमतौर पर दुर्गा के वाहन के रूप में देखा जाता है। सिंह में शक्ति, दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति को दर्शाया गया है। शेर की सवारी करने वाली देवी दुर्गा इन गुणों पर उनकी विशेषज्ञता का प्रतीक हैं। दुर्गा को अभय मुद्रा स्थिति में शेर पर देखा जाता है, जो भय से मुक्ति का प्रमाण देता है। एक जीव में सभी कोशिकाओं का कुल योग एक व्यक्ति होता है, इसलिए प्रत्येक कोशिका एक कोशिका की तरह होती है और उनका योग भगवान होता है और उससे परे वह निरपेक्ष होता है।देवी दुर्गा के अस्त्र शस्त्रदेवी दुर्गा के पास कई अस्त्र शस्त्र हैं। उसके हाथ में शंख डरा हुआ ओम या प्रणव का प्रतिनिधित्व करता है; वज्र दृढ़ता का प्रतिनिधित्व करता है; धनुष और तीर ऊर्जा का प्रतीक है; सुदर्शन चक्र जो उंगली पर घूमता है, यह दर्शाता है कि पूरी दुनिया उसके लिए आज्ञाकारी है और उसकी आज्ञा पर है; देवी दुर्गा द्वारा रखी गई तलवार ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है जो संदेह से बंधी नहीं है; त्रिशूल या त्रिशूल 3 अलग-अलग गुणों का प्रतीक है, राजस (गतिविधि), सतवा (निष्क्रियता) और तमस (गैर-गतिविधि)। वह मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक अर्थात् दुखों के 3 रूपों का उन्मूलनकर्ता भी है। देवी दुर्गा द्वारा धारण किया गया कमल, पूरी तरह से फूला नहीं समाता, सफलता का आश्वासन देता है, लेकिन अंतिमता नहीं।देवी दुर्गा की पूजादेवी दुर्गा की पूजा पूरे देश में की जाती है। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, झारखंड और बिहार में प्रमुख वार्षिक त्योहार है। महिषासुर पर दुर्गा की विजय दशहरे के रूप में मनाई जाती है, जिसे बंगाली में विजयदशमी के रूप में भी जाना जाता है। दशहरा को उत्तर भारत में रावण के खिलाफ राम की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को कश्मीर में शारिका के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि भक्ति के दौरान शक्ति उपासक देवी के 9 पहलुओं पर ध्यान करते हैं, जिन्हें नव दुर्गा के रूप में जाना जाता है। दशहरा नवरात्रि दक्षिण भारत में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को मैसूर में चामुंडेश्वरी कहा जाता है।नवरात्रि पूरे गुजरात में मनाई जाती है और अंतिम दिन महिषासुरमर्दिनी की विजय के उपलक्ष्य में गरबा का आयोजन किया जाता है। गोवा में, देवी दुर्गा को महागौरी के शांतिपूर्ण अवतार में पूजा जाता है। श्री शांतादुर्गा या संतेरी गोवा की संरक्षक देवी है। महाराष्ट्र में अंबाबाई और तुलजा भवानी के रूपों की पूजा की जाती है।आमतौर पर, भारत में अन्नपूर्णा और ललिता-महात्रिपुरसुंदरी के दो पहलुओं की पूजा की जाती है। श्री शंकर ने अन्नपूर्णा के रूप में दिव्य माँ की शक्ति, सुंदरता और महिमा की प्रशंसा करते हुए एक भक्तिपूर्ण भजन की रचना की, “अन्न का दाता।” `भोजन ‘सांसारिक व्यक्तियों और साधकों या आध्यात्मिक आकांक्षाओं के लिए समान रूप से माँ का वरदान है।भारत में दुर्गा मंदिरभारत में देवी दुर्गा के सबसे उल्लेखनीय मंदिर कोल्हापुर, महाराष्ट्र में अंबाबाई मंदिर, उत्तर कन्नड़ जिले, कर्नाटक में दुर्गम्बा मंदिर; छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में माँ बम्लेश्वरी मंदिर, कोलकाता में कालीघाट मंदिर; उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कुलंजरी माता मंदिर; कनक दुर्गा मंदिर, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश; पटना, बिहार में शीतला माता मंदिर; गोवा में शांता दुर्गा मंदिर; माउंट आबू, राजस्थान के पास अंबिका माता मंदिर; तुलजापुर, महाराष्ट्र में तुलजा भवानी मंदिर; बिरजा मंदिर जाजपुर, उड़ीसा में और कई अन्य मंदिर हैं।

दुर्गा माँ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब देवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया। परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति औ...