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देवी की पूजा में ज्योति क्यों जगायी जाती है?बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम की अध्यक्ष श्रीमती वनिता कासनियां पंजाबनवरात्रि, अष्टमी या देवी जागरण आदि के पूजन में देवी की ज्योति जगाने के पीछे क्या है पौराणिक कारण ? जानें, देवी मां का ज्योति अवतार ?देवीभागवत पुराण में कहा गया है–‘सृष्टि के आदि में एक देवी ही थी, उसने ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न किया; उससे ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र उत्पन्न हुए । अन्य सब कुछ उससे ही उत्पन्न हुआ । वह ऐसी पराशक्ति (महाशक्ति) है ।’सारा जगत अनादिकाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्ति की उपासना में लगा हुआ है । महाशक्ति ही सर्वोपरि है । ब्रह्म भी शक्ति के साथ पूजे जाते हैं । जैसे पुष्प से गंध अलग नहीं की जा सकती है, गंध ही चारों ओर फैल कर पुष्प का परिचय कराती है; उसी तरह शक्ति ही ब्रह्म का बोध कराती है । सभी जगह शक्ति का ही आदर और बोलबाला है क्योंकि शक्तिहीन वस्तु जगत में टिक ही नहीं सकती है । देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी ने धारण किया ज्योति-अवतार!!!!!!!!देवी (माता) की पूजा में ज्योति जगाने (जलाने) का सम्बन्ध देवी के ज्योति-अवतार से है । देवी के ज्योति-अवतार की कथा इस प्रकार से है—एक बार देवताओं और दैत्यों में युद्ध छिड़ गया । इस युद्ध में देवता विजयी हुए । इससे देवताओं के मन में अहंकार हो गया । सभी देवता अपने मन में कहते—‘यह विजय मेरे कारण हुई है, यदि मैं न होता तो विजय नहीं हो सकती थी ।’ मां जगदम्बा बड़ी कृपालु हैं । वे देवताओं के अहंकार को समझ गयीं । उनको पता था कि यह अहंकार देवताओं को ‘देवता’ नहीं रहने देगा । अहंकार के कारण ही असुर ‘असुर’ कहलाते हैं । देवताओं में वही अहंकार जड़े जमा रहा है, इसके कारण संसार को फिर कष्ट का सामना करना पड़ेगा।देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी एक ऐसे तेज:पुंज के रूप में उनके सामने प्रकट हो गयीं, वैसा तेज:पुंज आज तक किसी ने देखा न था । उस तेज:पुंज को देखकर सभी देवता हक्के-बक्के रह गये और एक-दूसरे से पूछने लगे—‘यह क्या है ? देवताओं को आश्चर्यचकित करने वाली यह माया किसके द्वारा रची गयी है ?’भ्रमित हुए देवराज इन्द्र ने वायुदेव को उस तेज:पुंज के बारे में पता लगाने के लिए भेजा । घमण्ड से भरे हुए वायुदेव ने उस तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने पूछा—‘तुम कौन हो ?’वायुदेव ने कहा—‘मैं वायु हूँ । मातरिश्वा हूँ । सबका प्राणस्वरूप हूँ । मैं ही सम्पूर्ण जगत का संचालन करता हूँ ।’तेज:पुंज ने वायुदेव के सामने एक तिनका रखकर कहा—‘यदि तुम सब कुछ संचालन कर सकते हो तो इस तिनके को चलाओ ।’वायुदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर तिनका टस-से-मस न हुआ । वे लज्जित होकर इन्द्रदेव के पास लौट आए और कहने लगे कि ‘यह कोई अद्भुत शक्ति है, इसके सामने तो मैं एक तिनका भी न उड़ा सका ।’देवराज इन्द्र ने फिर अग्निदेव को बुलाकर कहा—‘अग्निदेव ! चूंकि आप ही हम लोगों के मुख हैं इसलिए वहां जाकर यह मालूम कीजिए कि ये तेज:पुंज कौन है ? ‘इन्द्र के कहने पर अग्निदेव तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने अग्निदेव से पूछा —‘तुम कौन हो ? तुममें कौन-सा पराक्रम है, मुझे बतलाओ ?’अग्निदेव ने कहा—‘ मैं जातवेदा हूँ, अग्नि हूँ । सारे संसार को दग्ध करने की ताकत मुझमें है ।’ तेज:पुंज ने अग्निदेव से उस तिनके को जलाने के लिए कहा । अग्निदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर वे उस तिनके को जला न सके और मुंह लटकाकर इन्द्रदेव के पास लौट आये ।तब सभी देवता बोले—‘झूठा गर्व और अभिमान करने वाले हम लोग इस तेज:पुंज को जानने में समर्थ नहीं है, यह तो कोई अलौकिक शक्ति ही प्रतीत हो रही है । इन्द्रदेव ! आप हम सब के स्वामी हैं, अत: आप ही इस तेज:पुंज के बारे में पता लगाइए ।’तब सहस्त्र नेत्रों वाले इन्द्र स्वयं उस तेज:पुंज के पास पहुंचे । इन्द्र के पहुंचते ही वह तेज:पुंज गायब हो गया । यह देखकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए । तेज:पुंज के उनसे बात तक न करने के कारण वे अपने-आप को मन में छोटा समझने लगे । वे सोचने लगे कि अब मैं देवताओं को क्या मुंह दिखाऊंगा । मान ही महापुरुषों का धन है, जब मान ही न रहा तो इस शरीर का त्याग करना ही उचित है । इन्द्रदेव का सारा अहंकार नष्ट हो गया । तभी गगनमण्डल में आकाशवाणी हुई कि—‘इन्द्रदेव ! तुम पराशक्ति का ध्यान करो और उन्हीं की शरण में जाओ ।’ इन्द्रदेव पराशक्ति की शरण में आकर मायाबीज का जप करते हुए ध्यान करने लगे।एक दिन चैत्रमास की नवमी तिथि को मां पराम्बा (महाशक्ति) ने अपना स्वरूप प्रकट किया । वे अत्यन्त सुन्दरी थीं, लाल रंग की साड़ी पहने उनके अंग-अंग से नवयौवन फूट रहा था । उनमें करोड़ों चन्द्रमाओं से बढ़कर आह्लादकता थी । करोड़ों कामदेव उनके रूप पर न्यौछावर हो रहे थे । उन्होंने चमेली की माला व वेणी व लाल चंदन धारण किया हुआ था ।देवी बोलीं—‘मैं ही परब्रह्म हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही प्रणवरूपिणी हूँ । मेरी ही कृपा और शक्ति से तुम लोगों ने असुरों पर विजय पायी है । मेरी ही शक्ति से वायुदेव बहा करते हैं और अग्निदेव जलाया करते हैं । तुम लोग अहंकार छोड़कर सत्य को जानो ।’देवी के वचन सुनकर देवताओं को अपनी भूल ज्ञात हो गयी और वे अहंकार रूपी असुर से ग्रस्त होने से बच गये । उन्होंने क्षमा मांगकर देवी से प्रसन्न होने की प्रार्थना की और कहा कि आप हम पर ऐसी कृपा करें कि हममें कभी अहंकार न आए ।तब से देवी की पूजा—अष्टमी, नवरात्र व जागरण आदि में माता के ज्योति अवतार के रूप में ज्योति या अखण्ड ज्योति जगायी जाती है । नवरात्र में प्रतिदिन देवी की ज्योति जगाकर उसमें लोंग का जोड़ा, बताशा, नारियल की गिरी, घी, हलुआ-पूरी आदि का भोग लगाया जाता है ।तेरी ज्योति में वो जादू है,तकदीर बना देती है,जगमग जगती जब ज्योति तेरी,अंधकार मिटा देती है ।।

देवी की पूजा में ज्योति क्यों जगायी जाती है?


नवरात्रि, अष्टमी या देवी जागरण आदि के पूजन में देवी की ज्योति जगाने के पीछे क्या है पौराणिक कारण ? जानें, देवी मां का ज्योति अवतार ?

देवीभागवत पुराण में कहा गया है–‘सृष्टि के आदि में एक देवी ही थी, उसने ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न किया; उससे ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र उत्पन्न हुए । अन्य सब कुछ उससे ही उत्पन्न हुआ । वह ऐसी पराशक्ति (महाशक्ति) है ।’

सारा जगत अनादिकाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्ति की उपासना में लगा हुआ है । महाशक्ति ही सर्वोपरि है । ब्रह्म भी शक्ति के साथ पूजे जाते हैं । जैसे पुष्प से गंध अलग नहीं की जा सकती है, गंध ही चारों ओर फैल कर पुष्प का परिचय कराती है; उसी तरह शक्ति ही ब्रह्म का बोध कराती है । सभी जगह शक्ति का ही आदर और बोलबाला है क्योंकि शक्तिहीन वस्तु जगत में टिक ही नहीं सकती है । 

देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी ने धारण किया ज्योति-अवतार!!!!!!!!

देवी (माता) की पूजा में ज्योति जगाने (जलाने) का सम्बन्ध देवी के ज्योति-अवतार से है । देवी के ज्योति-अवतार की कथा इस प्रकार से है—

एक बार देवताओं और दैत्यों में युद्ध छिड़ गया । इस युद्ध में देवता विजयी हुए । इससे देवताओं के मन में अहंकार हो गया । सभी देवता अपने मन में कहते—‘यह विजय मेरे कारण हुई है, यदि मैं न होता तो विजय नहीं हो सकती थी ।’ 

मां जगदम्बा बड़ी कृपालु हैं । वे देवताओं के अहंकार को समझ गयीं । उनको पता था कि यह अहंकार देवताओं को ‘देवता’ नहीं रहने देगा । अहंकार के कारण ही असुर ‘असुर’ कहलाते हैं । देवताओं में वही अहंकार जड़े जमा रहा है, इसके कारण संसार को फिर कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी एक ऐसे तेज:पुंज के रूप में उनके सामने प्रकट हो गयीं, वैसा तेज:पुंज आज तक किसी ने देखा न था । उस तेज:पुंज को देखकर सभी देवता हक्के-बक्के रह गये और एक-दूसरे से पूछने लगे—‘यह क्या है ? देवताओं को आश्चर्यचकित करने वाली यह माया किसके द्वारा रची गयी है ?’

भ्रमित हुए देवराज इन्द्र ने वायुदेव को उस तेज:पुंज के बारे में पता लगाने के लिए भेजा । घमण्ड से भरे हुए वायुदेव ने उस तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने पूछा—‘तुम कौन हो ?’

वायुदेव ने कहा—‘मैं वायु हूँ । मातरिश्वा हूँ । सबका प्राणस्वरूप हूँ । मैं ही सम्पूर्ण जगत का संचालन करता हूँ ।’

तेज:पुंज ने वायुदेव के सामने एक तिनका रखकर कहा—‘यदि तुम सब कुछ संचालन कर सकते हो तो इस तिनके को चलाओ ।’

वायुदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर तिनका टस-से-मस न हुआ । वे लज्जित होकर इन्द्रदेव के पास लौट आए और कहने लगे कि ‘यह कोई अद्भुत शक्ति है, इसके सामने तो मैं एक तिनका भी न उड़ा सका ।’

देवराज इन्द्र ने फिर अग्निदेव को बुलाकर कहा—‘अग्निदेव ! चूंकि आप ही हम लोगों के मुख हैं इसलिए वहां जाकर यह मालूम कीजिए कि ये तेज:पुंज कौन है ? ‘

इन्द्र के कहने पर अग्निदेव तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने अग्निदेव से पूछा —‘तुम कौन हो ? तुममें कौन-सा पराक्रम है, मुझे बतलाओ ?’

अग्निदेव ने कहा—‘ मैं जातवेदा हूँ, अग्नि हूँ । सारे संसार को दग्ध करने की ताकत मुझमें है ।’ 

तेज:पुंज ने अग्निदेव से उस तिनके को जलाने के लिए कहा । अग्निदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर वे उस तिनके को जला न सके और मुंह लटकाकर इन्द्रदेव के पास लौट आये ।

तब सभी देवता बोले—‘झूठा गर्व और अभिमान करने वाले हम लोग इस तेज:पुंज को जानने में समर्थ नहीं है, यह तो कोई अलौकिक शक्ति ही प्रतीत हो रही है । इन्द्रदेव ! आप हम सब के स्वामी हैं, अत: आप ही इस तेज:पुंज के बारे में पता लगाइए ।’

तब सहस्त्र नेत्रों वाले इन्द्र स्वयं उस तेज:पुंज के पास पहुंचे । इन्द्र के पहुंचते ही वह तेज:पुंज गायब हो गया । यह देखकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए ।  तेज:पुंज के उनसे बात तक न करने के कारण वे अपने-आप को मन में छोटा समझने लगे । वे सोचने लगे कि अब मैं देवताओं को क्या मुंह दिखाऊंगा । मान ही महापुरुषों का धन है, जब मान ही न रहा तो इस शरीर का त्याग करना ही उचित है । इन्द्रदेव का सारा अहंकार नष्ट हो गया । 

तभी गगनमण्डल में आकाशवाणी हुई कि—‘इन्द्रदेव ! तुम पराशक्ति का ध्यान करो और उन्हीं की शरण में जाओ ।’ इन्द्रदेव पराशक्ति की शरण में आकर मायाबीज का जप करते हुए ध्यान करने लगे।

एक दिन चैत्रमास की नवमी तिथि को मां पराम्बा (महाशक्ति) ने अपना स्वरूप प्रकट किया । वे अत्यन्त सुन्दरी थीं, लाल रंग की साड़ी पहने उनके अंग-अंग से नवयौवन फूट रहा था । उनमें करोड़ों चन्द्रमाओं से बढ़कर आह्लादकता थी । करोड़ों कामदेव उनके रूप पर न्यौछावर हो रहे थे । उन्होंने चमेली की माला व वेणी व लाल चंदन धारण किया हुआ था ।

देवी बोलीं—‘मैं ही परब्रह्म हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही प्रणवरूपिणी हूँ । मेरी ही कृपा और शक्ति से तुम लोगों ने असुरों पर विजय पायी है । मेरी ही शक्ति से वायुदेव बहा करते हैं और अग्निदेव जलाया करते हैं । तुम लोग अहंकार छोड़कर सत्य को जानो ।’

देवी के वचन सुनकर देवताओं को अपनी भूल ज्ञात हो गयी और वे अहंकार रूपी असुर से ग्रस्त होने से बच गये । उन्होंने क्षमा मांगकर देवी से प्रसन्न होने की प्रार्थना की और कहा कि आप हम पर ऐसी कृपा करें कि हममें कभी अहंकार न आए ।

तब से देवी की पूजा—अष्टमी, नवरात्र व जागरण आदि में माता के ज्योति अवतार के रूप में ज्योति या अखण्ड ज्योति जगायी जाती है । नवरात्र में प्रतिदिन देवी की ज्योति जगाकर उसमें लोंग का जोड़ा, बताशा, नारियल की गिरी, घी, हलुआ-पूरी आदि का भोग लगाया जाता है ।
तेरी ज्योति में वो जादू है,
तकदीर बना देती है,
जगमग जगती जब ज्योति तेरी,
अंधकार मिटा देती है ।।

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मां दुर्गा की भेंट ______________ मन उपवन के फूल माँ तुमको चढ़ाऊँ कैसे हमतो पहाड़ों की गुफ़ाओं में तुमको ही ढूँढा करते हैं हो माँ तुमको ही ढूँढा करते हैं कहाँ छुप गई है मैया हमारी,कहाँ खोगई है माँ ममता तुम्हारी चैन नहीं बैचैन मेरा मन में लगन है कि दर्शन हो तेरा ढूँढूँ कहाँ आजा तू माँ हमतो पहाड़ों की गुफ़ाओं में तुमही को ढूँढा करते हैं करदो माँ पूरी इच्छा हमारी,सदियों से रोए माँ अँखियाँ हमारी आजा तू माँ ढूँढूँ कहाँ । हम तो पहाड़ों की …………… टेढ़ी डगर है माँ लम्बा सफ़र है तेरा हाथ सर पे माँ हमें क्या फ़िकर है आजा तू माँ ढूँढूँ कहाँ हमतो पहाड़ों की गुफ़ाओं में तुमही को ढूँढा करते हैं हो माँ तुमही को ढूँढा करते हैं ********************************************* माता की भेंट माँ मेरी विपदा दूर करो,  माँ मेरी विपदा दूर करो तेरी शरण में अाया हूँ ,  आकर मेरे कष्ट हरो तू ही अम्बे काली है दुखड़े हरने वाली है चरण पड़े की लाज रखो  माँ मेरी विपदा दूर करो भक्तो ने तुझे पुकारा है तूने दिया सहारा है विनती पे मेरी ध्यान धरो  माँ मेरी विपदा दूर करो शरण तुम्हारी आये है इस जग के ठुकराये है पाप ताप सन्...

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दुर्गा माँBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबदेवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया।परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति और गतिविधियों की चर्चा देवी महात्म्यम में आगे की गई है। दुर्गा, भगवान शिव की पत्नी पार्वती का एक और पहलू है। देवी काली को उनके अवतारों में से एक माना जाता है। उन्हें दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती की माँ के रूप में चित्रित किया जाता है, जिन्हें अश्विन के महीने में मनाया जाने वाला नवरात्रि भी कहा जाता है।देवी दुर्गा की उत्पत्तिदेवी महात्म्यम के अनुसार, देवी दुर्गा का गठन असुर महिष से लड़ने के लिए एक योद्धा देवी के रूप में किया गया था। दानव ने पृथ्वी, स्वर्ग और नरक को आतंकित कर दिया था और देवता उसे हराने में विफल रहे क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक पुरुष द्वारा पराजित नहीं होने का वरदान दिया था। ब्रह्मा के नेतृत्व में देवताओं ने विष्णु और शिव से मदद के लिए संपर्क किया। पवित्र त्रिमूर्ति ने तब अपनी दिव्य चमक को एकजुट किया और देवी दुर्गा प्रकट हुईं। वह महिषासुर का सफाया करने और सभी दिव्य प्राणियों को बचाने के लिए उभरी थी। उसने शिव के त्रिशूल, विष्णु के चक्र, ब्रह्मा के कमंडलु, इंद्र के वज्र, कुबेर के रत्नहार आदि विभिन्न देवताओं से अपने हथियार प्राप्त किए।बाल वनिता महिला आश्रमराक्षसी महिषासुर ने उन दोनों के बीच एक लड़ाई में उसके बदलते रूपों के खिलाफ एक उग्र लड़ाई लड़ी, लेकिन आखिरकारदुर्गा माँ ने उसका वाढ कर दिया। इस प्रकार, वह महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी जानी जाती है – महिषासुर का वध करने वाली।अपने विभिन्न पहलुओं में देवी की पूजा शरद ऋतु में की जाती है, जो बंगाल में फसल के मौसम के उद्घाटन का प्रतीक है। दुर्गा की शरदकालीन पूजा में, उनका पहला प्रतिनिधि बिल्व वृक्ष की एक शाखा है। दूसरे चरण में प्रतिनिधि नवपात्रिका है – मादा वृक्ष, अन्य पौधों और जड़ी-बूटियों के पेड़ के साथ बनाया गया। इसके अलावा मां को अक्सर चावल (धान्यरूप) के साथ पूजा में पहचाना जाता है। दुर्गा का एक उपपत्नी शाकाम्वरी है, अर्थात जड़ी-बूटी पौष्टिक देवी।देवी दुर्गा की कथादेवी दुर्गा को देवी का अवतार माना जाता है जिसके कई रूप हैं। देवी कई किंवदंतियों से जुड़ी हुई हैं जैसे कि पार्वती और भगवान शिव की कथा, रावण, शिव और पार्वती की कथा, भगवान राम और दुर्गा की कथा और विष्णु की पौराणिक कथा पार्वती की कथा।देवी दुर्गा के अवतारदेवी दुर्गा के कई अवतार और अवतार हैं, जैसे गौरी, भवानी, ललिता, कमंडलिनी, राजेश्वरी, जावा आदि। इनके अलावा, उनके 9 अन्य पदनाम भी हैं जिन्हें नव दुर्गा, ब्रह्मचारिणी, शैलपुत्री, चंद्रघंटा, कालरात्रि, स्कंदमाता, सिद्धिदात्री, महागौरी, कुसुमंदा और कात्यायनी के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गा के अन्य अवतारों में पार्वती, करुणामयी, अंबिका और काली शामिल हैं।देवी दुर्गा की विशेषताएँ और प्रतीकआमतौर पर, देवी दुर्गा को लाल रंग के कपड़े (साड़ी) पहनाया जाता है, जहां रंग लाल कार्रवाई और बुराई से सुरक्षा का प्रतीक है। उसे कई वस्तुओं को ले जाने वाली 10 या 8 भुजाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जो हिंदू धर्म में 10 दिशाओं या 8 चौकों का प्रतीक है, जो यह भी दर्शाता है कि वह भक्तों को सभी दिशाओं से बचाता है। दुर्गा को 3 आँखें होने के रूप में भी चित्रित किया गया है और इस प्रकार, उन्हें त्रयम्बक भी कहा जाता है जिसका अर्थ है 3 आँखें देवी। दाईं आंख सूर्य द्वारा प्रतीक कार्रवाई का प्रतीक है, बाईं आंख चंद्रमा की ओर संकेत करती है; और केंद्रीय नेत्र अग्नि के प्रतीक ज्ञान को दर्शाता है।पूँजीवादी पितृसत्ता एक साथ निजीकरण और मातृत्व से प्यार करने वाली माताओं और स्वस्थ शिशुओं के संस्थागतकरण की है। गंगा के डेल्टा में बंगालियों की विशिष्ट पहचान के रूप में उभरने के साथ, टेंडर मदरहुड की भावना की पुष्टि प्राकृतिक सेटिंग में हुई, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इतनी स्पष्ट रूप से अच्छी तरह से पानी और उपजाऊ (सुजलान सुपहलंग, शस्यश्यामलांग) बताया। मिट्टी की प्राकृतिक इनाम ने एक स्नेही माँ के रूप में बंगाल के प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित किया, जो अपने बच्चों की मांगों का जवाब देने के लिए तैयार थी। धार्मिक दुर्जनों के अलावा, देवी दुर्गा राष्ट्रवाद और अर्थव्यवस्था के स्तंभों के बीच अपने मावेरिक्स का नक्शा बनाती हैं। वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी देवता है।शेर या बाघ को आमतौर पर दुर्गा के वाहन के रूप में देखा जाता है। सिंह में शक्ति, दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति को दर्शाया गया है। शेर की सवारी करने वाली देवी दुर्गा इन गुणों पर उनकी विशेषज्ञता का प्रतीक हैं। दुर्गा को अभय मुद्रा स्थिति में शेर पर देखा जाता है, जो भय से मुक्ति का प्रमाण देता है। एक जीव में सभी कोशिकाओं का कुल योग एक व्यक्ति होता है, इसलिए प्रत्येक कोशिका एक कोशिका की तरह होती है और उनका योग भगवान होता है और उससे परे वह निरपेक्ष होता है।देवी दुर्गा के अस्त्र शस्त्रदेवी दुर्गा के पास कई अस्त्र शस्त्र हैं। उसके हाथ में शंख डरा हुआ ओम या प्रणव का प्रतिनिधित्व करता है; वज्र दृढ़ता का प्रतिनिधित्व करता है; धनुष और तीर ऊर्जा का प्रतीक है; सुदर्शन चक्र जो उंगली पर घूमता है, यह दर्शाता है कि पूरी दुनिया उसके लिए आज्ञाकारी है और उसकी आज्ञा पर है; देवी दुर्गा द्वारा रखी गई तलवार ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है जो संदेह से बंधी नहीं है; त्रिशूल या त्रिशूल 3 अलग-अलग गुणों का प्रतीक है, राजस (गतिविधि), सतवा (निष्क्रियता) और तमस (गैर-गतिविधि)। वह मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक अर्थात् दुखों के 3 रूपों का उन्मूलनकर्ता भी है। देवी दुर्गा द्वारा धारण किया गया कमल, पूरी तरह से फूला नहीं समाता, सफलता का आश्वासन देता है, लेकिन अंतिमता नहीं।देवी दुर्गा की पूजादेवी दुर्गा की पूजा पूरे देश में की जाती है। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, झारखंड और बिहार में प्रमुख वार्षिक त्योहार है। महिषासुर पर दुर्गा की विजय दशहरे के रूप में मनाई जाती है, जिसे बंगाली में विजयदशमी के रूप में भी जाना जाता है। दशहरा को उत्तर भारत में रावण के खिलाफ राम की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को कश्मीर में शारिका के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि भक्ति के दौरान शक्ति उपासक देवी के 9 पहलुओं पर ध्यान करते हैं, जिन्हें नव दुर्गा के रूप में जाना जाता है। दशहरा नवरात्रि दक्षिण भारत में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को मैसूर में चामुंडेश्वरी कहा जाता है।नवरात्रि पूरे गुजरात में मनाई जाती है और अंतिम दिन महिषासुरमर्दिनी की विजय के उपलक्ष्य में गरबा का आयोजन किया जाता है। गोवा में, देवी दुर्गा को महागौरी के शांतिपूर्ण अवतार में पूजा जाता है। श्री शांतादुर्गा या संतेरी गोवा की संरक्षक देवी है। महाराष्ट्र में अंबाबाई और तुलजा भवानी के रूपों की पूजा की जाती है।आमतौर पर, भारत में अन्नपूर्णा और ललिता-महात्रिपुरसुंदरी के दो पहलुओं की पूजा की जाती है। श्री शंकर ने अन्नपूर्णा के रूप में दिव्य माँ की शक्ति, सुंदरता और महिमा की प्रशंसा करते हुए एक भक्तिपूर्ण भजन की रचना की, “अन्न का दाता।” `भोजन ‘सांसारिक व्यक्तियों और साधकों या आध्यात्मिक आकांक्षाओं के लिए समान रूप से माँ का वरदान है।भारत में दुर्गा मंदिरभारत में देवी दुर्गा के सबसे उल्लेखनीय मंदिर कोल्हापुर, महाराष्ट्र में अंबाबाई मंदिर, उत्तर कन्नड़ जिले, कर्नाटक में दुर्गम्बा मंदिर; छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में माँ बम्लेश्वरी मंदिर, कोलकाता में कालीघाट मंदिर; उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कुलंजरी माता मंदिर; कनक दुर्गा मंदिर, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश; पटना, बिहार में शीतला माता मंदिर; गोवा में शांता दुर्गा मंदिर; माउंट आबू, राजस्थान के पास अंबिका माता मंदिर; तुलजापुर, महाराष्ट्र में तुलजा भवानी मंदिर; बिरजा मंदिर जाजपुर, उड़ीसा में और कई अन्य मंदिर हैं।

दुर्गा माँ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब देवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया। परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति औ...