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श्री दुर्गा कवचBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबश्री दुर्गा कवचऋषि मार्कंड़य ने पूछा जभी !दया करके ब्रह्माजी बोले तभी !!के जो गुप्त मंत्र है संसार में !हैं सब शक्तियां जिसके अधिकार में !!हर इक का कर सकता जो उपकार है !जिसे जपने से बेडा ही पार है !!पवित्र कवच दुर्गा बलशाली का !जो हर काम पूरे करे सवाल का !!सुनो मार्कंड़य मैं समझाता हूँ !मैं नवदुर्गा के नाम बतलाता हूँ !!कवच की मैं सुन्दर चोपाई बना !जो अत्यंत हैं गुप्त देयुं बता !!नव दुर्गा का कवच यह, पढे जो मन चित लाये !उस पे किसी प्रकार का, कभी कष्ट न आये !!कहो जय जय जय महारानी की !जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!पहली शैलपुत्री कहलावे !दूसरी ब्रह्मचरिणी मन भावे !!तीसरी चंद्रघंटा शुभ नाम !चौथी कुश्मांड़ा सुखधाम !!पांचवी देवी अस्कंद माता !छटी कात्यायनी विख्याता !!सातवी कालरात्रि महामाया !आठवी महागौरी जग जाया !!नौवी सिद्धिरात्रि जग जाने !नव दुर्गा के नाम बखाने !!महासंकट में बन में रण में !रुप होई उपजे निज तन में !!महाविपत्ति में व्योवहार में !मान चाहे जो राज दरबार में !!शक्ति कवच को सुने सुनाये !मन कामना सिद्धी नर पाए !!चामुंडा है प्रेत पर, वैष्णवी गरुड़ सवार !बैल चढी महेश्वरी, हाथ लिए हथियार !!कहो जय जय जय महारानी की !जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!हंस सवारी वारही की !मोर चढी दुर्गा कुमारी !!लक्ष्मी देवी कमल असीना !ब्रह्मी हंस चढी ले वीणा !!ईश्वरी सदा बैल सवारी !भक्तन की करती रखवारी !!शंख चक्र शक्ति त्रिशुला !हल मूसल कर कमल के फ़ूला !!दैत्य नाश करने के कारन !रुप अनेक किन्हें धारण !!बार बार मैं सीस नवाऊं !जगदम्बे के गुण को गाऊँ !!कष्ट निवारण बलशाली माँ !दुष्ट संहारण महाकाली माँ !!कोटी कोटी माता प्रणाम !पूरण की जो मेरे काम !!दया करो बलशालिनी, दास के कष्ट मिटाओ !चमन की रक्षा को सदा, सिंह चढी माँ आओ !!कहो जय जय जय महारानी की !जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!अग्नि से अग्नि देवता !पूरब दिशा में येंदरी !!दक्षिण में वाराही मेरी !नैविधी में खडग धारिणी !!वायु से माँ मृग वाहिनी !पश्चिम में देवी वारुणी !!उत्तर में माँ कौमारी जी!ईशान में शूल धारिणी !!ब्रहामानी माता अर्श पर !माँ वैष्णवी इस फर्श पर !!चामुंडा दसों दिशाओं में, हर कष्ट तुम मेरा हरो !संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!सन्मुख मेरे देवी जया !पाछे हो माता विजैया !!अजीता खड़ी बाएं मेरे !अपराजिता दायें मेरे !!नवज्योतिनी माँ शिवांगी !माँ उमा देवी सिर की ही !!मालाधारी ललाट की, और भ्रुकुटी कि यशर्वथिनी !भ्रुकुटी के मध्य त्रेनेत्रायम् घंटा दोनो नासिका !!काली कपोलों की कर्ण, मूलों की माता शंकरी !नासिका में अंश अपना, माँ सुगंधा तुम धरो !!संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!ऊपर वाणी के होठों की !माँ चन्द्रकी अमृत करी !!जीभा की माता सरस्वती !दांतों की कुमारी सती !!इस कठ की माँ चंदिका !और चित्रघंटा घंटी की !!कामाक्षी माँ ढ़ोढ़ी की !माँ मंगला इस बनी की !!ग्रीवा की भद्रकाली माँ !रक्षा करे बलशाली माँ !!दोनो भुजाओं की मेरे, रक्षा करे धनु धारनी !दो हाथों के सब अंगों की, रक्षा करे जग तारनी !!शुलेश्वरी, कुलेश्वरी, महादेवी शोक विनाशानी !जंघा स्तनों और कन्धों की, रक्षा करे जग वासिनी !!हृदय उदार और नाभि की, कटी भाग के सब अंग की !गुम्हेश्वरी माँ पूतना, जग जननी श्यामा रंग की !!घुटनों जन्घाओं की करे, रक्षा वो विंध्यवासिनी !टकखनों व पावों की करे, रक्षा वो शिव की दासनी !!रक्त मांस और हड्डियों से, जो बना शरीर !आतों और पित वात में, भरा अग्न और नीर !!बल बुद्धि अंहकार और, प्राण ओ पाप समान !सत रज तम के गुणों में, फँसी है यह जान !!धार अनेकों रुप ही, रक्षा करियो आन !तेरी कृपा से ही माँ, चमन का है कल्याण !!आयु यश और कीर्ति धन, सम्पति परिवार !ब्रह्मणी और लक्ष्मी, पार्वती जग तार !!विद्या दे माँ सरस्वती, सब सुखों की मूल !दुष्टों से रक्षा करो, हाथ लिए त्रिशूल !!भैरवी मेरी भार्या की, रक्षा करो हमेश !मान राज दरबार में, देवें सदा नरेश !!यात्रा में दुःख कोई न, मेरे सिर पर आये !कवच तुम्हारा हर जगह, मेरी करे सहाए !!है जग जननी कर दया, इतना दो वरदान !लिखा तुम्हारा कवच यह, पढे जो निश्चय मान !!मन वांछित फल पाए वो, मंगल मोड़ बसाए !कवच तुम्हारा पढ़ते ही, नवनिधि घर मे आये !!ब्रह्माजी बोले सुनो मार्कंड़य !यह दुर्गा कवच मैंने तुमको सुनाया !!रहा आज तक था गुप्त भेद सारा !जगत की भलाई को मैंने बताया !!सभी शक्तियां जग की करके एकत्रित !है मिट्टी की देह को इसे जो पहनाया !!चमन जिसने श्रद्धा से इसको पढ़ा जो !सुना तो भी मुह माँगा वरदान पाया !!जो संसार में अपने मंगल को चाहे !तो हरदम कवच यही गाता चला जा !!बियाबान जंगल दिशाओं दशों में !तू शक्ति की जय जय मनाता चला जा !!तू जल में तू थल में तू अग्नि पवन में !कवच पहन कर मुस्कुराता चला जा !!निडर हो विचर मन जहाँ तेरा चाहे !चमन पाव आगे बढ़ता चला जा !!तेरा मान धन धान्य इससे बढेगा !तू श्रद्धा से दुर्गा कवच को जो गाए !!यही मंत्र यन्त्र यही तंत्र तेरा !यही तेरे सिर से हर संकट हटायें !!यही भूत और प्रेत के भय का नाशक !यही कवच श्रद्धा व भक्ति बढ़ाये !!इसे निसदिन श्रद्धा से पढ़ कर !जो चाहे तो मुह माँगा वरदान पाए !!इस स्तुति के पाठ से पहले कवच पढे !कृपा से आधी भवानी की, बल और बुद्धि बढे !!श्रद्धा से जपता रहे, जगदम्बे का नाम !सुख भोगे संसार में, अंत मुक्ति सुखधाम !!कृपा करो मातेश्वरी, बालक चमन नादाँ !तेरे दर पर आ गिरा, करो मैया कल्याण !!बाल वनिता महिला आश्रम!! जय माता दी !!

ऋषि मार्कंड़य ने पूछा जभी !
दया करके ब्रह्माजी बोले तभी !!
के जो गुप्त मंत्र है संसार में !
हैं सब शक्तियां जिसके अधिकार में !!
हर इक का कर सकता जो उपकार है !
जिसे जपने से बेडा ही पार है !!
पवित्र कवच दुर्गा बलशाली का !
जो हर काम पूरे करे सवाल का !!
सुनो मार्कंड़य मैं समझाता हूँ !
मैं नवदुर्गा के नाम बतलाता हूँ !!
कवच की मैं सुन्दर चोपाई बना !
जो अत्यंत हैं गुप्त देयुं बता !!
नव दुर्गा का कवच यह, पढे जो मन चित लाये !
उस पे किसी प्रकार का, कभी कष्ट न आये !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
पहली शैलपुत्री कहलावे !
दूसरी ब्रह्मचरिणी मन भावे !!
तीसरी चंद्रघंटा शुभ नाम !
चौथी कुश्मांड़ा सुखधाम !!
पांचवी देवी अस्कंद माता !
छटी कात्यायनी विख्याता !!
सातवी कालरात्रि महामाया !
आठवी महागौरी जग जाया !!
नौवी सिद्धिरात्रि जग जाने !
नव दुर्गा के नाम बखाने !!
महासंकट में बन में रण में !
रुप होई उपजे निज तन में !!
महाविपत्ति में व्योवहार में !
मान चाहे जो राज दरबार में !!
शक्ति कवच को सुने सुनाये !
मन कामना सिद्धी नर पाए !!
चामुंडा है प्रेत पर, वैष्णवी गरुड़ सवार !
बैल चढी महेश्वरी, हाथ लिए हथियार !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
हंस सवारी वारही की !
मोर चढी दुर्गा कुमारी !!
लक्ष्मी देवी कमल असीना !
ब्रह्मी हंस चढी ले वीणा !!
ईश्वरी सदा बैल सवारी !
भक्तन की करती रखवारी !!
शंख चक्र शक्ति त्रिशुला !
हल मूसल कर कमल के फ़ूला !!
दैत्य नाश करने के कारन !
रुप अनेक किन्हें धारण !!
बार बार मैं सीस नवाऊं !
जगदम्बे के गुण को गाऊँ !!
कष्ट निवारण बलशाली माँ !
दुष्ट संहारण महाकाली माँ !!
कोटी कोटी माता प्रणाम !
पूरण की जो मेरे काम !!
दया करो बलशालिनी, दास के कष्ट मिटाओ !
चमन की रक्षा को सदा, सिंह चढी माँ आओ !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
अग्नि से अग्नि देवता !
पूरब दिशा में येंदरी !!
दक्षिण में वाराही मेरी !
नैविधी में खडग धारिणी !!
वायु से माँ मृग वाहिनी !
पश्चिम में देवी वारुणी !!
उत्तर में माँ कौमारी जी!
ईशान में शूल धारिणी !!
ब्रहामानी माता अर्श पर !
माँ वैष्णवी इस फर्श पर !!
चामुंडा दसों दिशाओं में, हर कष्ट तुम मेरा हरो !
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
सन्मुख मेरे देवी जया !
पाछे हो माता विजैया !!
अजीता खड़ी बाएं मेरे !
अपराजिता दायें मेरे !!
नवज्योतिनी माँ शिवांगी !
माँ उमा देवी सिर की ही !!
मालाधारी ललाट की, और भ्रुकुटी कि यशर्वथिनी !
भ्रुकुटी के मध्य त्रेनेत्रायम् घंटा दोनो नासिका !!
काली कपोलों की कर्ण, मूलों की माता शंकरी !
नासिका में अंश अपना, माँ सुगंधा तुम धरो !!
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
ऊपर वाणी के होठों की !
माँ चन्द्रकी अमृत करी !!
जीभा की माता सरस्वती !
दांतों की कुमारी सती !!
इस कठ की माँ चंदिका !
और चित्रघंटा घंटी की !!
कामाक्षी माँ ढ़ोढ़ी की !
माँ मंगला इस बनी की !!
ग्रीवा की भद्रकाली माँ !
रक्षा करे बलशाली माँ !!
दोनो भुजाओं की मेरे, रक्षा करे धनु धारनी !
दो हाथों के सब अंगों की, रक्षा करे जग तारनी !!
शुलेश्वरी, कुलेश्वरी, महादेवी शोक विनाशानी !
जंघा स्तनों और कन्धों की, रक्षा करे जग वासिनी !!
हृदय उदार और नाभि की, कटी भाग के सब अंग की !
गुम्हेश्वरी माँ पूतना, जग जननी श्यामा रंग की !!
घुटनों जन्घाओं की करे, रक्षा वो विंध्यवासिनी !
टकखनों व पावों की करे, रक्षा वो शिव की दासनी !!
रक्त मांस और हड्डियों से, जो बना शरीर !
आतों और पित वात में, भरा अग्न और नीर !!
बल बुद्धि अंहकार और, प्राण ओ पाप समान !
सत रज तम के गुणों में, फँसी है यह जान !!
धार अनेकों रुप ही, रक्षा करियो आन !
तेरी कृपा से ही माँ, चमन का है कल्याण !!
आयु यश और कीर्ति धन, सम्पति परिवार !
ब्रह्मणी और लक्ष्मी, पार्वती जग तार !!
विद्या दे माँ सरस्वती, सब सुखों की मूल !
दुष्टों से रक्षा करो, हाथ लिए त्रिशूल !!
भैरवी मेरी भार्या की, रक्षा करो हमेश !
मान राज दरबार में, देवें सदा नरेश !!
यात्रा में दुःख कोई न, मेरे सिर पर आये !
कवच तुम्हारा हर जगह, मेरी करे सहाए !!
है जग जननी कर दया, इतना दो वरदान !
लिखा तुम्हारा कवच यह, पढे जो निश्चय मान !!
मन वांछित फल पाए वो, मंगल मोड़ बसाए !
कवच तुम्हारा पढ़ते ही, नवनिधि घर मे आये !!
ब्रह्माजी बोले सुनो मार्कंड़य !
यह दुर्गा कवच मैंने तुमको सुनाया !!
रहा आज तक था गुप्त भेद सारा !
जगत की भलाई को मैंने बताया !!
सभी शक्तियां जग की करके एकत्रित !
है मिट्टी की देह को इसे जो पहनाया !!
चमन जिसने श्रद्धा से इसको पढ़ा जो !
सुना तो भी मुह माँगा वरदान पाया !!
जो संसार में अपने मंगल को चाहे !
तो हरदम कवच यही गाता चला जा !!
बियाबान जंगल दिशाओं दशों में !
तू शक्ति की जय जय मनाता चला जा !!
तू जल में तू थल में तू अग्नि पवन में !
कवच पहन कर मुस्कुराता चला जा !!
निडर हो विचर मन जहाँ तेरा चाहे !
चमन पाव आगे बढ़ता चला जा !!
तेरा मान धन धान्य इससे बढेगा !
तू श्रद्धा से दुर्गा कवच को जो गाए !!
यही मंत्र यन्त्र यही तंत्र तेरा !
यही तेरे सिर से हर संकट हटायें !!
यही भूत और प्रेत के भय का नाशक !
यही कवच श्रद्धा व भक्ति बढ़ाये !!
इसे निसदिन श्रद्धा से पढ़ कर !
जो चाहे तो मुह माँगा वरदान पाए !!
इस स्तुति के पाठ से पहले कवच पढे !
कृपा से आधी भवानी की, बल और बुद्धि बढे !!
श्रद्धा से जपता रहे, जगदम्बे का नाम !
सुख भोगे संसार में, अंत मुक्ति सुखधाम !!
कृपा करो मातेश्वरी, बालक चमन नादाँ !
तेरे दर पर आ गिरा, करो मैया कल्याण !!

बाल वनिता महिला आश्रम
!! जय माता दी !!

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मां दुर्गा की भेंट

मां दुर्गा की भेंट ______________ मन उपवन के फूल माँ तुमको चढ़ाऊँ कैसे हमतो पहाड़ों की गुफ़ाओं में तुमको ही ढूँढा करते हैं हो माँ तुमको ही ढूँढा करते हैं कहाँ छुप गई है मैया हमारी,कहाँ खोगई है माँ ममता तुम्हारी चैन नहीं बैचैन मेरा मन में लगन है कि दर्शन हो तेरा ढूँढूँ कहाँ आजा तू माँ हमतो पहाड़ों की गुफ़ाओं में तुमही को ढूँढा करते हैं करदो माँ पूरी इच्छा हमारी,सदियों से रोए माँ अँखियाँ हमारी आजा तू माँ ढूँढूँ कहाँ । हम तो पहाड़ों की …………… टेढ़ी डगर है माँ लम्बा सफ़र है तेरा हाथ सर पे माँ हमें क्या फ़िकर है आजा तू माँ ढूँढूँ कहाँ हमतो पहाड़ों की गुफ़ाओं में तुमही को ढूँढा करते हैं हो माँ तुमही को ढूँढा करते हैं ********************************************* माता की भेंट माँ मेरी विपदा दूर करो,  माँ मेरी विपदा दूर करो तेरी शरण में अाया हूँ ,  आकर मेरे कष्ट हरो तू ही अम्बे काली है दुखड़े हरने वाली है चरण पड़े की लाज रखो  माँ मेरी विपदा दूर करो भक्तो ने तुझे पुकारा है तूने दिया सहारा है विनती पे मेरी ध्यान धरो  माँ मेरी विपदा दूर करो शरण तुम्हारी आये है इस जग के ठुकराये है पाप ताप सन्...

*❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️ 🥀👣🥀जय माँ महागौरी🥀👣🥀 ⛳🕉️⛳शुभ दिन⛳🕉️⛳ *बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम*🌹🙏🙏🌹------------------------------------------------------------------- 🌼‼️🙏‼️🌼------------------------------------------------------------------- 🥀 श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। 🌀 महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥"दुर्गा अष्टमी की समस्त माँ भक्तो को हार्दिक शुभकामनाएं" 💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥💠💥**आज माता का अष्टम स्वरूप माँ महागौरी के श्री चरणों में नमन करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि माताआप सभी को सुख-शांति व आरोग्य प्रदान करे**।

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दुर्गा माँBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबदेवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया।परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति और गतिविधियों की चर्चा देवी महात्म्यम में आगे की गई है। दुर्गा, भगवान शिव की पत्नी पार्वती का एक और पहलू है। देवी काली को उनके अवतारों में से एक माना जाता है। उन्हें दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती की माँ के रूप में चित्रित किया जाता है, जिन्हें अश्विन के महीने में मनाया जाने वाला नवरात्रि भी कहा जाता है।देवी दुर्गा की उत्पत्तिदेवी महात्म्यम के अनुसार, देवी दुर्गा का गठन असुर महिष से लड़ने के लिए एक योद्धा देवी के रूप में किया गया था। दानव ने पृथ्वी, स्वर्ग और नरक को आतंकित कर दिया था और देवता उसे हराने में विफल रहे क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक पुरुष द्वारा पराजित नहीं होने का वरदान दिया था। ब्रह्मा के नेतृत्व में देवताओं ने विष्णु और शिव से मदद के लिए संपर्क किया। पवित्र त्रिमूर्ति ने तब अपनी दिव्य चमक को एकजुट किया और देवी दुर्गा प्रकट हुईं। वह महिषासुर का सफाया करने और सभी दिव्य प्राणियों को बचाने के लिए उभरी थी। उसने शिव के त्रिशूल, विष्णु के चक्र, ब्रह्मा के कमंडलु, इंद्र के वज्र, कुबेर के रत्नहार आदि विभिन्न देवताओं से अपने हथियार प्राप्त किए।बाल वनिता महिला आश्रमराक्षसी महिषासुर ने उन दोनों के बीच एक लड़ाई में उसके बदलते रूपों के खिलाफ एक उग्र लड़ाई लड़ी, लेकिन आखिरकारदुर्गा माँ ने उसका वाढ कर दिया। इस प्रकार, वह महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी जानी जाती है – महिषासुर का वध करने वाली।अपने विभिन्न पहलुओं में देवी की पूजा शरद ऋतु में की जाती है, जो बंगाल में फसल के मौसम के उद्घाटन का प्रतीक है। दुर्गा की शरदकालीन पूजा में, उनका पहला प्रतिनिधि बिल्व वृक्ष की एक शाखा है। दूसरे चरण में प्रतिनिधि नवपात्रिका है – मादा वृक्ष, अन्य पौधों और जड़ी-बूटियों के पेड़ के साथ बनाया गया। इसके अलावा मां को अक्सर चावल (धान्यरूप) के साथ पूजा में पहचाना जाता है। दुर्गा का एक उपपत्नी शाकाम्वरी है, अर्थात जड़ी-बूटी पौष्टिक देवी।देवी दुर्गा की कथादेवी दुर्गा को देवी का अवतार माना जाता है जिसके कई रूप हैं। देवी कई किंवदंतियों से जुड़ी हुई हैं जैसे कि पार्वती और भगवान शिव की कथा, रावण, शिव और पार्वती की कथा, भगवान राम और दुर्गा की कथा और विष्णु की पौराणिक कथा पार्वती की कथा।देवी दुर्गा के अवतारदेवी दुर्गा के कई अवतार और अवतार हैं, जैसे गौरी, भवानी, ललिता, कमंडलिनी, राजेश्वरी, जावा आदि। इनके अलावा, उनके 9 अन्य पदनाम भी हैं जिन्हें नव दुर्गा, ब्रह्मचारिणी, शैलपुत्री, चंद्रघंटा, कालरात्रि, स्कंदमाता, सिद्धिदात्री, महागौरी, कुसुमंदा और कात्यायनी के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गा के अन्य अवतारों में पार्वती, करुणामयी, अंबिका और काली शामिल हैं।देवी दुर्गा की विशेषताएँ और प्रतीकआमतौर पर, देवी दुर्गा को लाल रंग के कपड़े (साड़ी) पहनाया जाता है, जहां रंग लाल कार्रवाई और बुराई से सुरक्षा का प्रतीक है। उसे कई वस्तुओं को ले जाने वाली 10 या 8 भुजाओं का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जो हिंदू धर्म में 10 दिशाओं या 8 चौकों का प्रतीक है, जो यह भी दर्शाता है कि वह भक्तों को सभी दिशाओं से बचाता है। दुर्गा को 3 आँखें होने के रूप में भी चित्रित किया गया है और इस प्रकार, उन्हें त्रयम्बक भी कहा जाता है जिसका अर्थ है 3 आँखें देवी। दाईं आंख सूर्य द्वारा प्रतीक कार्रवाई का प्रतीक है, बाईं आंख चंद्रमा की ओर संकेत करती है; और केंद्रीय नेत्र अग्नि के प्रतीक ज्ञान को दर्शाता है।पूँजीवादी पितृसत्ता एक साथ निजीकरण और मातृत्व से प्यार करने वाली माताओं और स्वस्थ शिशुओं के संस्थागतकरण की है। गंगा के डेल्टा में बंगालियों की विशिष्ट पहचान के रूप में उभरने के साथ, टेंडर मदरहुड की भावना की पुष्टि प्राकृतिक सेटिंग में हुई, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इतनी स्पष्ट रूप से अच्छी तरह से पानी और उपजाऊ (सुजलान सुपहलंग, शस्यश्यामलांग) बताया। मिट्टी की प्राकृतिक इनाम ने एक स्नेही माँ के रूप में बंगाल के प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित किया, जो अपने बच्चों की मांगों का जवाब देने के लिए तैयार थी। धार्मिक दुर्जनों के अलावा, देवी दुर्गा राष्ट्रवाद और अर्थव्यवस्था के स्तंभों के बीच अपने मावेरिक्स का नक्शा बनाती हैं। वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी देवता है।शेर या बाघ को आमतौर पर दुर्गा के वाहन के रूप में देखा जाता है। सिंह में शक्ति, दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति को दर्शाया गया है। शेर की सवारी करने वाली देवी दुर्गा इन गुणों पर उनकी विशेषज्ञता का प्रतीक हैं। दुर्गा को अभय मुद्रा स्थिति में शेर पर देखा जाता है, जो भय से मुक्ति का प्रमाण देता है। एक जीव में सभी कोशिकाओं का कुल योग एक व्यक्ति होता है, इसलिए प्रत्येक कोशिका एक कोशिका की तरह होती है और उनका योग भगवान होता है और उससे परे वह निरपेक्ष होता है।देवी दुर्गा के अस्त्र शस्त्रदेवी दुर्गा के पास कई अस्त्र शस्त्र हैं। उसके हाथ में शंख डरा हुआ ओम या प्रणव का प्रतिनिधित्व करता है; वज्र दृढ़ता का प्रतिनिधित्व करता है; धनुष और तीर ऊर्जा का प्रतीक है; सुदर्शन चक्र जो उंगली पर घूमता है, यह दर्शाता है कि पूरी दुनिया उसके लिए आज्ञाकारी है और उसकी आज्ञा पर है; देवी दुर्गा द्वारा रखी गई तलवार ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है जो संदेह से बंधी नहीं है; त्रिशूल या त्रिशूल 3 अलग-अलग गुणों का प्रतीक है, राजस (गतिविधि), सतवा (निष्क्रियता) और तमस (गैर-गतिविधि)। वह मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक अर्थात् दुखों के 3 रूपों का उन्मूलनकर्ता भी है। देवी दुर्गा द्वारा धारण किया गया कमल, पूरी तरह से फूला नहीं समाता, सफलता का आश्वासन देता है, लेकिन अंतिमता नहीं।देवी दुर्गा की पूजादेवी दुर्गा की पूजा पूरे देश में की जाती है। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम, झारखंड और बिहार में प्रमुख वार्षिक त्योहार है। महिषासुर पर दुर्गा की विजय दशहरे के रूप में मनाई जाती है, जिसे बंगाली में विजयदशमी के रूप में भी जाना जाता है। दशहरा को उत्तर भारत में रावण के खिलाफ राम की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को कश्मीर में शारिका के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि भक्ति के दौरान शक्ति उपासक देवी के 9 पहलुओं पर ध्यान करते हैं, जिन्हें नव दुर्गा के रूप में जाना जाता है। दशहरा नवरात्रि दक्षिण भारत में भी मनाया जाता है। देवी दुर्गा को मैसूर में चामुंडेश्वरी कहा जाता है।नवरात्रि पूरे गुजरात में मनाई जाती है और अंतिम दिन महिषासुरमर्दिनी की विजय के उपलक्ष्य में गरबा का आयोजन किया जाता है। गोवा में, देवी दुर्गा को महागौरी के शांतिपूर्ण अवतार में पूजा जाता है। श्री शांतादुर्गा या संतेरी गोवा की संरक्षक देवी है। महाराष्ट्र में अंबाबाई और तुलजा भवानी के रूपों की पूजा की जाती है।आमतौर पर, भारत में अन्नपूर्णा और ललिता-महात्रिपुरसुंदरी के दो पहलुओं की पूजा की जाती है। श्री शंकर ने अन्नपूर्णा के रूप में दिव्य माँ की शक्ति, सुंदरता और महिमा की प्रशंसा करते हुए एक भक्तिपूर्ण भजन की रचना की, “अन्न का दाता।” `भोजन ‘सांसारिक व्यक्तियों और साधकों या आध्यात्मिक आकांक्षाओं के लिए समान रूप से माँ का वरदान है।भारत में दुर्गा मंदिरभारत में देवी दुर्गा के सबसे उल्लेखनीय मंदिर कोल्हापुर, महाराष्ट्र में अंबाबाई मंदिर, उत्तर कन्नड़ जिले, कर्नाटक में दुर्गम्बा मंदिर; छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में माँ बम्लेश्वरी मंदिर, कोलकाता में कालीघाट मंदिर; उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में कुलंजरी माता मंदिर; कनक दुर्गा मंदिर, विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश; पटना, बिहार में शीतला माता मंदिर; गोवा में शांता दुर्गा मंदिर; माउंट आबू, राजस्थान के पास अंबिका माता मंदिर; तुलजापुर, महाराष्ट्र में तुलजा भवानी मंदिर; बिरजा मंदिर जाजपुर, उड़ीसा में और कई अन्य मंदिर हैं।

दुर्गा माँ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब देवी दुर्गा ब्रह्माण्ड की जननी देवी का एक अवतार हैं और उन्हें दुनिया के निर्माण, संरक्षण और विनाश के पीछे की ताकत माना जाता है। माँ दुर्गा, जिसका अर्थ है संस्कृत में अजेय, को 10 भुजाओं के रूप में चित्रित किया जाता है, जो बाघ या शेर पर सवार होती हैं। वह अपने हाथों में विभिन्न हथियार रखती हैं जिसमें भगवान विष्णु का चक्र और भगवान शिव का एक कमल का फूल भी शामिल है। देवी दुर्गा अपने चेहरे पर ध्यानपूर्ण मुस्कान से सजी मुद्रा या हाथ के इशारों का अभ्यास करती दिखाई देती हैं। ऐसा माना जाता है कि वह शक्ति का अवतार है और स्वेतन्त्र्य या आत्मनिर्भरता की स्थिति में विद्यमान है। हिंदू देवी दुर्गा तब प्रकट हुई जब देवताओं को महिषासुर की राक्षसी और बुरी शक्तियों से खतरा था। सभी देवताओं ने अपने दिव्य तेज को एकजुट किया और महिषासुर के नेतृत्व में राक्षसों को जीतने के लिए उसे बनाया। परम पूज्य देवी, दुर्गा का वर्णन तत्यारेय ब्राह्मण, तैत्तिरीय-अरण्यका, वाजसनेयी संहिता और यजुर वेद जैसी विभिन्न पांडुलिपियों में किया गया है। इसके अलावा, दुर्गा की उत्पत्ति औ...